Sunday, May 10, 2009
फिल्मों की भौंडी नकल भर रह गए हैं धारावाहिक
रोमांस यहां भी है। कभी घर एक सपना सीरियल में तो कभी रियलिटी शो के रूप में। आज की तारीख में फिल्मों में संबंधों को लेकर कुछ प्रयोग हो रहे हैं। तो धारावाहिक भी उस ओर हैं। बंदिनी में अपने से तिगुनी उम्र के दुल्हे से शादी करनेवाली संतू हो या भाग्यविधाता में पकरौवा शादी का फिल्मांकन। नकल बुरी बात नहीं है, लेकिन वह इतनी व्यवस्थित और अनुशासित हो कि कट-पेस्ट नहीं लगे। प्रयोग जारी है...
'महात्माÓ को केवल 'गुरूदेवÓ की जरूरत पड़ती है
पिछली सात मई को कवींद्र रवींद्र नाथ टैगोर की १४९वां जन्म दिन था। साहित्य के क्षेत्र में देश को एममात्र नोबेल पुरस्कार की मुस्कान देनेवाले गुरूदेव की संसद भवन में लगी आदमकद प्रतिमा से यह लगता ही नहीं कि परेशानी ने इन्हें कभी छुआ हो। पुस्तकालय भवन की ओर जानेवाले रास्ते पर गुरूदेव बैठे हैं शायद हमारे पढ़े-अनपढ़ नुमाइंदे को यह बताना चाह रहे हैं कि बिना पढ़े संसद भवन में पैर रखना घोर नैतिक पापा है। गुलाम हिंदुस्तान के अजेय योद्घा महात्मा गांधी से इसी नैतिक मुद्दे पर उनका स्वस्थ अखबारी विमर्श उस गुलामी में भी लोकतंत्र की नई-नई कोंपल फेंकता था। आज के वैयक्तिक अखबारी विमर्श के स्तर को देखकर गुरूदेव याद तो आते हैं।गुरूदेव की महत्ता इस बात में नहीं थी कि वे परम भट्टï विद्वान थे। उनकी महत्ता इस बात में भी नहीं थी कि वे युगद्रष्टा, महान साहित्यकार, दार्शनिक, संगीतज्ञ, चित्रकार, शिक्षाविद्, सामाजिक कार्यकर्ता, राष्ट्रवादी, मानवतावादी आदि विशेषणों की शोभा बढ़ाते थे। बल्कि उनकी महत्ता इसमें थी कि बापू के सहयोग के लिए सीधे साबरमती नहीं जाकर शांति निकेतन में रहकर ऐसी धुनी रमाई कि अपने आप बापू के आजू-बाजू पूरी फौज खड़ी कर हो गई। ठीक वैसे ही जैसे चाणक्य ने चंद्रगुप्त के लिए की थी। आजादी के बाद ऐसी एक ही जुगलबंदी दिखती है इंदिरा गांधी और श्रीकांत वर्मा की। वर्मा जी ने ही इंदिरा जी के लिए गरीबी हटाओ का अभेद्य नारा तैयार किया था। आज की तारीख में गुरूदेव के वंशजों में अमत्र्य सेन और रामचंद्र गुहा जैसों के नाम याद आते हैं जो हमारे सभ्यता-संस्कृति-जीवन-इतिहास की परतें खोलकर शासक के लिए नई दिशा गढ़ रहे हैं।दो शब्द गुरूदेव-महात्माआप शासक की यात्रा तय करके महात्मा हो सकते हैं लेकिन गुरूदेव की जरूरत तब भी पड़ेगी। इसलिए प्लेटो ने दार्शनिक राजा की परिकल्पना की थी। अब दोनों गुण एक व्यक्ति में विरले मिलते हैं सो कसौटी वही रही लेकिन व्यक्ति दो रहे। गुरूदेव की भूमिका कनफ्यूशियस जैसी दिखती है। अपने समय में वे भारत में वही काम कर रहे थे जो लेनिन के देश में लियो टाल्सटाय कर रहे थे। प्रकृति के सान्निध्य से ऊर्जा लेनेवाले गुरूदेव शायद अकेले महापुरुष हैं विश्व इतिहास में जिन्हें एक नहीं दो संप्रभु देशों के लिए राष्टï्रगान लिखा। इन्होंने दो देशों भारत और बांग्लादेश के लिए राष्ट्रीय गान लिखा। बचपन से कुशाग्र बुद्धि के रवींद्रनाथ ने देश और विदेशी साहित्य, दर्शन, संस्कृति आदि को अपने अंदर समाहित कर लिया था और वह मानवता को विशेष महत्व देते थे। इसकी झलक उनकी रचनाओं में भी स्पष्ट रूप से प्रदर्शित होती है। साहित्य के क्षेत्र में उन्होंने अपूर्व योगदान दिया और उनकी रचना गीतांजलि के लिए उन्हें साहित्य के नोबल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था। उन्होंने एक दर्जन से अधिक उपन्यास लिखे। इन रचनाओं में चोखेर बाली, घरे बाइरे, गोरा आदि शामिल हैं। उनके उपन्यासों में मध्यम वर्गीय समाज विशेष रूप से उभर कर सामने आया है। लेकिन गोरा सबसे विशिष्टï है। इस उपन्यास में ब्रिटिश कालीन भारत का जिक्र है। राष्ट्रीयता और मानवता की चर्चा के साथ पारंपरिक हिन्दू समाज और ब्रह्मï समाज पर बहस के साथ विभिन्न प्रचलित समस्याओं पर प्रकाश डाला गया है। इसके साथ ही उसमें स्वतंत्रता संग्राम का भी जिक्र आया है। इतना समय बीत जाने के बाद भी बहुत हद तक उसकी प्रासंगिकता कायम है। इसके अलावा जहां तक उनकी कविता का प्रश्न है तो उनकी कविताओं में अध्यात्मवाद का विशेष जोर रहा है। इसके साथ ही उनकी कविताओं में उपनिषद जैसी भावनाएं महसूस होती हैं। साहित्य की शायद ही कोई शाखा हो जिनमें उनकी रचनाएं नहीं हों। उन्होंने कविता, गीत, कहानी, उपन्यास, नाटक आदि सभी विधाओं में रचनाएं कीं। लेकिन विश्व ने उनको जाना उनकी कृतियों के अंग्रेजी में हुए अनुवाद से। इस अनुवाद का ही कमाल था कि गीतांजलि को साहित्य के नोबेल पुरस्कार के लिए चुना गया। अंग्रे्रजी अनुवाद के बाद पूरा विश्व उनकी प्रतिभा से परिचित हुआ। सात मई 1861 को जोडासांको में पैदा हुए रवींद्रनाथ के नाटक भी अनोखे हैं। हालांकि उन्हें सांकेतिक नाटक ज्यादा लिखे हैं। उनके नाटकों में डाकघर, राजा, विसर्जन आदि शामिल हैं। बचपन से ही रवींद्रनाथ की विलक्षण प्रतिभा का आभास लोगों को होने लगा था। उन्होंने पहली कविता सिर्फ आठ साल में लिखी थी और केवल 16 साल की उम्र में उनकी पहली लघुकथा प्रकाशित हुई थी। रवींद्रनाथ की रचनाओं में मानव और ईश्वर के बीच का स्थाई संपर्क कई रूपों में उभरता है। इसके अलावा उन्हें बचपन से ही प्रकृति का साथ काफी पसंद था। रवींद्रनाथ चाहते थे कि विद्यार्थियों को प्रकृति के सान्निध्य में अध्ययन करना चाहिए। उन्होंने इसी सोच को मूर्त रूप देने के लिए शांति निकेतन की स्थापना की। रवींद्र संगीत बांग्ला संस्कृति का अभिन्न अंग बन गया है। हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत से प्रभावित उनके गीत मानवीय भावनाओं के विभिन्न रंग पेश करते हैं। गुरूदेव बाद के दिनों में चित्र भी बनाने लगे थे। रवींद्रनाथ ने अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, चीन सहित दर्जनों देशों की यात्राएं की थी। सात अगस्त 1941 को देश की यह महान विभूति पंचतत्व में विलीन हो गई। लेकिन शांति निकेतन में फैलाई उनकी ज्योति अभी भी जल रही है।
पप्पू क्यों, बीबी क्यों नहीं
ये तो होना था...
चाहे जितनी मंदी हो, घर और शराब तो चाहिए...
तुम कौन हो
बीआरटी कॉरिडोर की बस हो या
धौला कुआं ओवरब्रिज पर चलती इनोवा
ट्रांस यमुना की सड़क पर हिचकोले खाती ब्लूलाइन
या रोहिणी की कॉलोनियों में १० रूपए की रिक्शा
तुम कौन हो
किचन की 'प्रगति हो
सास-बहू सीरियल की सास हो
नच ले विद सरोज खान की सरोज हो
कि होंठ रसीले वाली मलाइका अरोड़ा
तुम कौन हो
कल्पना चावला की मां हो
कि उसकी कल्पना से आईपिल्स खाती हो
बोलो, चुप क्यों हो
कहीं ऐसा तो नहीं कि
शंकराचार्य को हराने के बाद तुम चुप हो गईं
कौन हो तुम
एक गोद में लैपटॉप, दूसरे में बेटा
घर लौटो तो बिस्तर पे पति
दिन में काम-पुत्र, रात में काम-पति
तुम कौन हो
जब कपड़े का आविष्कार न हुआ था
पिता के कहने से परशुराम ने काटा था सिर
आज बिना पूछे मारते हैं थप्पड़
कौन हो देवि
सुना है ब्रह्म, विष्णु, महेश को दूध पिलाया तुमने
फिर आज फिगर की फिकर करती हो
तुम कौन हो
Monday, May 4, 2009
लिपस्टिक के साथ वोट क्यों नहीं है फैशन में
इनके चोटिल अहं को मरहम मिलता है। शायद...
इन दिनों क्या कर रहे हैं सोप और रियलिटी शोज
करने में उन्हें कितना समय लगेगा।पुरुष भारी पड़ रहे हैं स्त्रियों परसोप्स की टारगेट व्यूअर महिलाएं हैं। लेकिन आईपीएल और चुनावी बहसें देखने के लिए वे रात ८-११ बजे का टाइम प्रेफर करते हैं, ताकि चाय पीते हुए ऑफिस की थकान उतारी जा सके। इसलिए रात का समय तो बुक है। बचा दोपहर का रिपीट टाइम, तो इस समय तपती गर्मी ने ज्यादातर घरों से दोपहर को बिजली गायब कर दी है। इससे बचा-खुचा चांस भी खत्म। अब तो बच्चे भी मैच के दीवाने हैंपिछली बार की रिपोर्ट थी कि लगभग ४२ प्रतिशत लोगों ने आईपीएल के मैच देखे। यानी उतने फीसदी दर्शकों ने सोप्स नहीं देखे। इस बार इससे भी खतरनाक स्थिति यह है कि आजकल बच्चे शिन चान जैसे कार्टून कैरेक्टर की बहस छोड़कर गिलक्रिस्ट के छक्के और युवराज की हैट्रिक की चर्चा में शाम को खेलने भी निकल रहे घर से बाहर। तो समझें कि इस बार लगभग आधे लोग आईपीएल और बाकी चुनाव देखेंगे। आने वाले दिनों में टीआरपी की रिपोर्ट इस बात की तस्दीक करेगी।
१० पैसे में १ ईमेल पढऩे को मिले तो...
तो साइबर कैफे की आमदनी बहुत घट जाएगी और क्या! लेकिन यह संभव कैसे होगा? बस एक अकाउंट खोलना होगा द्वशड्ढद्गद्ग.द्बठ्ठ पर। इसके बाद अगर आप रोजाना एक रूपए शुल्क खर्च करते हैं तो रोज अपना १० ईमेल पढ़ सकते हैं अपने मोबाइल पर। यानी ३० रूपए महीना चार्ज। लेकिन ७९ रूपए में महीने भर अनलिमिटेड ईमेल एक्सेस कर सकते हैं। यह राशि आप कैश, चेक या क्रेडिट/डेबिट कार्ड से पे कर सकते हैं, लेकिन पेमेंट में देरी होने पर मोबाइल की टॉक वैल्यू से एक भी पैसा नहीं कटेगा।यह सेवा किसी भी सेलफोन पर यहां तक कि बेसिक ब्लैक एंड व्हाइट मोबाइल पर भी उपलब्ध होगी क्योंकि इस सेवा के लिए किसी जीपीआरएस, वैप या हाई फाई कनेक्शन की जरूरत नहीं। तकनीक का असली कमाल ये है कि ईमेल मोबाइल पर एसएमएस की तर्ज पर दिखेगा और ४८० कैरेक्टर तक पढऩे की सुविधा देगा। यानी ऑनलाइन पत्र का मजमून आप आसानी से समझ सकेंगे। आइए, जानते हैं इसकी अन्य विशेषताएं।मोबीडॉटइन पर आईडी खोलेंमोबीडॉटइन पर अपना ईमेल एकाउंट खोलें। फिर अलग-अलग ईमेल अकाउंट पर अपना मोबी आईडी फॉरवर्ड करें। इसके बाद जब भी कोई ईमेल आपके मेल बॉक्स में आएगी, यह तुरंत ट्रांसफर हो जाएगी आपके मोबी अकाउंट में और वहां से मोबी इसे आपके सेल पर ट्रांसफर कर देगी। ईमेल बन जाएगी एसएमएसचूंकि इस सेवा के लिए जीपीआरएस, वैप या वाई फाई सुविधा की जरूरत नहीं होती सो ईमेल पढऩे का एक ही रास्ता बचता है और वह है आपका मैसेज बॉक्स। मोबी किसी भी ईमेल को एसएमएस की शक्ल में भेजती है मोबाइल पर। इससे अब किसी को यह शिकायत नहीं होगी कि यार नेट बहुत स्लो है, ईमेल नहीं खुल रही। यानी बैंडविथ या स्पैक्ट्रम स्पीड के झंझट से छुटकारा।ईमेल का जवाब भी दे सकते हैं आपमोबी आपको किसी भी मेल आईडी की तर्ज पर रीड, रीप्लाय, रीप्लाय ऑल और सेंड आदि की सुविधा देती है। साथ ही आप किसी डॉक्यूमेंट को अटैच करके भी भेज सकते हैं। डॉक्यूमेंट अटैच करने पर आपको अटैचमेंट नंबर या कोड मिलेगा। मेल करते समय आपको उस खास कोड का उल्लेख करें ताकि रिसीवर अपने कंप्यूटर या लैपटॉप पर उस कोड पर क्लिक करके आपके भेजे गए अटैचमेंट को खोल सके। ४८० कैरेक्टर्स तक मेल पढ़ सकते हैं आपहर मेल १६० कैरेक्टर्स के तीन पैकेट्स में आपको दिखेगा। यह सीमा इसलिए है कि कहीं एक ही मैसेज से पूरा मैसेज बॉक्स न भर जाए।स्पैम को रोकने का ऑप्शन है यहांज्यादा स्पैम मैसेज की भरमार नहीं हो जाए, इसके लिए मोबी अकाउंट खोलते समय मेन ईमेल अकाउंट में संदेहास्पद आईडी को या तो ब्लॉक कर दें या फिर ब्लैकलिस्ट करें। इसके बाद आप जरूरी ईमेल आईडी को व्हाइटलिस्ट में डाल दें। इससे मोबाइल के मैसेज बॉक्स में सिर्फ व्हाइट लिस्टेड ईमेल ही आएंगी।यूजर सबसे बड़ा राजा हैइसलिए इस सेवा में आप ज्यों ही स्टॉप का एसएमएस मोबी को भेजेंगे, मोबाइल पर मैसेज आना बंद हो जाएगा और जरूरत पडऩे पर स्टार्ट का एसएमएस मोबी को भेजने पर नई ईमेल के साथ पहले की पेंडिंग पड़ी सभी ईमेल्स देख सकेंगे।
सपनों का घर आया आपके मोबाइल परमोबाइल पर
आम निवेशकों का ख्याल करती नई पेंशन योजना
इसके अलावा इस स्कीम में किसी भी स्टेज पर टैक्स छूट नहीं है। आशा कीजिए कि इस निवेश पर टैक्स छूट हो सरकार की तरफ से, वरना आम निवेशक इससे मुंह मोड़ सकते हैं।
Wednesday, April 29, 2009
Sunday, April 19, 2009
एक आंसू शन्नो के नाम
पहली पत्नी का कल्याण नहीं कर सके, उन्हें आत्महत्या के पाप से नहीं बचा सके, एक पत्नीव्रत मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम अपनी पत्नी को गर्भकाल में तड़ीपाड़ (आज की परिभाषा के अनुसार, क्योंकि तब माता सीता के आचरण से सामाजिक समरसता टूट रही थी) घोषित करते हैं तो फिर उस स्कूल के टीचर (जो खुद महिला सशक्तिकरण से त्रस्त हैं) अपने स्टूडेंट्स की टूटती शादी कैसे बचाएंगे। मैं बच्चों का 'स्कूलÓ नहीं छुड़वाना चाहता, लेकिन यह तो तय हो कि 'स्कूलÓ में 'ब्लैकबोर्डÓ पर 'व्हाइट मार्करÓ चलाने वाला इतना योग्य जरूर हो कि शन्नो कोमा में जाने को विवश नहीं हो, या फिर मदरसे में इतने 'दरवाजे-खिड़कियांÓ खोले जाएं कि कोई शन्नो 'स्कूलÓ आने की हसरत नहीं पाले, तब भी आईएएस हो जाए...
...एक तड़ीपार, एक को पेरोलाभी
वरुण गांधी को पेरोल पर छोड़ा गया। माननीय अदालत ने उन पर लगाए गए एनएसए (राष्टï्रीय सुरक्षा कानून) को भाव नहीं दिया औैर कागज पर शर्तनामा लिखवाकर 'मैदानÓ में खुला छोड़ दिया। कानून के विशेषज्ञ कहते हैं कि उच्च और उच्चतम न्यायालय के पास यह अधिकार है कि ज्यूरी सजा के दायरे में आए या आनेवाले किसी अपराधी या संंदिग्ध के मामले को उसकी 'ग्रेविटीÓ के आधार पर जज करके, विशेष कारणवश कुछ दिनों के लिए जेल से बाहर खुली हवा में सांस लेने की अुनमति दे सकती है। इसी सिलसिले में वरुण गांधी को १४ दिनों के लिए खुली हवा में सांस लेने का मौका दिया गया, ताकि वे संसद पहुंचने की परीक्षा (चुनाव) का फार्म भर सकें। यहां तक मामला बिलकुल परफेक्ट शेप में दिखता है, क्योंकि हमारा कानून कहता है कि दोषी भले छूट जाएं, निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चाहिए और यहां तो वरुण पर एनएसए भी राज्य सरकार ने लगाया है। लेकिन जब उसी न्यायालय की यह बात याद आती है कि न्याय होना नहीं, दिखना भी चाहिए, तो डर लगता है।मेरे डर को जरा आप भी सुनें। प्राकृतिक न्याय का तकाजा है कि जब किसी जानवर से जान-माल का खतरा हो तो उसे मार दिया जाए। ऐसे ही अगर किसी व्यक्ति विशेष से समाज की समरसता मिटने का भय हो, तो पहले कदम के तौर पर ऐसे व्यक्ति को समाज से तड़ीपार किया जाता है, जैसा वेलेंटाइनों की शादी करवाने पर तुले श्रीराम सेना के प्रमोद मुतालिक के साथ किया गया, या फिर जैसा बिग बॉस के घर में साथ रह रहे अपने साथी जुल्फी की बुटीक में बवाल करने के बाद राजा भैया के साथ किया गया। और इससे भी जब बात बनती नहीं दिखती तब या तो इन जैसे समाजभंजकों के लिए जेल की काली कोठरी है या फिर न्यायालय के आदेश पर सीधे स्वर्ग की टिकट। यहां आप मामले पर गौर फरमाएं, प्रमोद मुतालिक के चेलों ने पब से लड़कियों को घसीटकर पीटा था, बदले में तड़ीपार हुआ, लेकिन जब वरुण पीलीभीत में, सामाजिक मंच पर, समाज की मौजूदगी में, समाज में धार्मिक हिंसा फैलाने के लिए 'कच्चा मालÓ (उनके जहर बुझे भाषण) तैयार करते हैं, तो माननीय अदालत उन्हें पेरोल पर बाहर आकर चुनाव लडऩे की अनुमति देती है। मेरा माननीय अदालत की अवमानना का कोई विचार नहीं है लेकिन एक आम नागरिक की तर्ज पर न्यायिक संस्था से यह पूछने का मूल अधिकार तो है ही कि वरुण और संजय दत्त जैसों के लिए जेल के बजाए खुली हवा क्यों? हालांकि माननीय अदालत के उस तर्क से 'कानून पसंद नागरिकोंÓ को रूहआफ्जा वाली दिली ठंडक मिली, जिसमें ये कहा गया कि अदालत कोई गलत नजीर नहीं पेश करना चाहती, आप देखें कि यही संजय चुनावी सभा में एक मुख्यमंत्री को पप्पी और झप्पी देना चाहते हैं। खैर, मैं वापस आता हूं अपने डर पर। कल को अगर मोहम्मद अफजल अदालत से दरख्वास्त करें कि उन्हें मरने से पहले काबा की पवित्र यात्रा करने दिया जाए, तो क्या अदालत सरकारी खर्च पर उन्हें काबा भेजेगी? अभी मोहम्मद अजमल अमीर कसाब ने अदालत में बयान दिया कि उसने जब अपराध किया, तब वह नाबालिग था, सो उसका केस बाल अदालत में चलाया जाए। कानूनी भाषा में अगर कसाब २६/११ को नाबालिग थे, तो उन पर बाल अदालत में ही मुकदमा चलाया जाना चाहिए, लेकिन अदालत ने कसाब की वह मांग खारिज कर दी। अगर न्याय की परिभाषा है कि कटघरे में खड़े व्यक्ति को बचाव का पूरा मौका दिया जाएगा, तब तो कायदे से कसाब की बात की टेस्टिंग कर लेनी चाहिए थी।
भारत क्या, कहीं भी ऐसा नहीं होगा, क्योंकि कसाब जैसों के साथ 'देशÓ नामक भावना जुड़ जाती है। ये तो सबने देखा, महसूस किया कि कसाब और उनके साथियों ने देश की छाती पर कैसा नंगा नाच किया, लेकिन उसी देश ने यह भी देखा, सुना और महसूस किया कि वरुण ने सामाजिक मंच से नंगा नाच किया। फर्क सिर्फ गोली और बोली का है। मान लीजिए कि भारत, अमेरिका हो गया। ऐसे में वह निश्चित रूप से कसाब और उनके आकाओं को कब्र से भी निकालकर फांसी देने की कुव्वत रखता है, लेकिन एक और बार मानिए कि भारत की संसद में भगवान श्रीहरि विष्णु औैर अल्ला दोनों सांसद बनकर आ गए तो दोनों मिलकर भी क्या वरुण की बोली (हालांकि उनकी बोली की फोरेंसिक जांच चल रही है) के मैन और साइड इफैक्ट से देश को बचा पाएंगे? मंडल की टीस आज भी समाज भोग रहा है, बाबरी मस्जिद की 'लाल ईंटेंÓ देश हर पल अपनी छाती पर महसूस करता है। १२० करोड़ की आबादी में, एक मां को छोड़ कोई भी वरुण के सीधे बचाव में नहीं आया, तो फिर पेरोल क्यों? अगर केस कमजोर था और मामला हाई ्रप्रोफाइल था तो रोजाना सुनवाई करवाई जाती (८४ के सिख दंगे वाले केस में किया गया) होती, फैसला होता, निर्दोष होते तो छाती ठोंककर संसद फतह करते।====================================तो बात बन जाएं!क्या चल रहा है, कैसे जीवन का मजा लिया जा रहा है, यह ऐसे सवाल है जो आपको निराश भी कर सकते हैै। भीड़ भरी जिंदगी और भागती लाइफ में यदि कुछ पल का आराम मिल जाये तो यार बात ही बन जाये। लेकिन इन पलों को कहां और कैसे तलाशते है जरा सोचिए, टीवी देखकर, बाहर घूमकर, घर का काम करके आदि। यह लिस्ट काफी लंबी होती है लेकिन आराम और चैन कहां। बोरिंग लाइफ में नया पन लाने के लिये आपको जरूरी है कि आपकी लव लाइफ को मस्ती भरा होना। अब आप सोचेंगे कि यह कैसे। जी हां, यदि आपकी सेक्स या लव लाइफ बिलकुल मस्ती के टै्रक पर है तो सोचिए कि आप स्वस्थ, खुशनुमा इंसान है। क्या आप अपने सेक्स जीवन में निरसता का अनुभव कर रहे हैं? कुछ ऐसे साधारण से उपाय हैं, जो नीरस सेक्स जीवन में नए रंग भर सकते हैं। जिससे जिंदगी में एक नया उत्साह आ जायेगा।आँखों की पट्टी: सिल्क या अन्य किसी कपड़े की छोटी पट्टी बनाइए और अपने साथी की आँखों को ढक दीजिए। इसके बाद उन्हें सोचने दीजिए कि आप क्या करने वाले हैं। नए प्रयोग कीजिए। आँखों पर पट्टी बंधी होने से आपके साथी को भी कुछ अलग सा अहसास होगा। लुकाछिपी का यह खेल काफी मजेदार साबित हो सकता है। आजमा कर देखिए. सुगंधित तेल:अच्छी खुशबू दिलो दिमाग को तरोताज़ा कर देती है। आप अपने शयनकक्ष में कुछ ऐसे सुगंधित तेल रख सकते हैं, जिनका इस्तेमाल मसाज करने मे किया जा सकता हो। यह भी कुछ नया अनुभव देगा। हथकड़ी: सचमुच की ना सही! किसी भी कपड़े का इस्तेमाल आप हथकड़ी बनाने में कर सकते हैं। बस अपने साथी के हाथ कपड़े से बांध दीजिए [ध्यान रखें की उन्हें चोट ना लगे]। इस तरह से कुछ देर के लिए वह आपका गुलाम बन जाएगा (यकीन मानिए इससे उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी)। इसके बाद के क्षण आपके होंगे! बड़ा सा आईना: कभी कभी खुद अपने वे क्षण देखना भी रोमांचकारी हो सकता है। तो क्यों ना आप अपने पलंग के पास किसी बड़े आईने को रख दें। इसके नतीजे रोमांचकारी होंगे। सोफ्टी: रसोईघर में जाएं और फ्रिज में से सोफ्टी, स्ट्राबेरी, क्रीम, जैम अथवा जेली कुछ भी ले निकाल लीजिए। यह सूची कितनी भी लम्बी हो सकती है। अब यह आपके और आपके साथी के ऊपर है कि आप दोनों इनका किस तरह से इस्तेमाल करते हैं। प्रयोग तो अनेकों हैं। कुछ नया सोचिए।
लिपस्टिक: जी हां, लिपस्टिक से एक-दूसरे की बॉडी पर किस करने की प्रतियोगिता आपको एक नया अंदाज भी देगी। ये सभी प्रयोग सेक्स जीवन और अंतरंग क्षणों में नए रंग भर सकते हैं। लेकिन ये पल बेहद निजी होते हैं, इसलिए आप स्वयं ही जान सकते हैं कि आप दोनों कैसे चरम संतुष्टि पा सकते हैं। और जीवन को रंगीन बना सकते है।
