Sunday, May 10, 2009

फिल्मों की भौंडी नकल भर रह गए हैं धारावाहिक

हल्ला किया जा रहा है कि फिल्में पुरुष पर फोकस करती हैं जबकि धारावाहिक महिलाओं पर। यहां मेरी आपत्ति है। तनिक आप भी सुनें। समाज पुरुष प्रधान जरूर है लेकिन जब शो की बात आती है तो पहले महिला को पोर्टेट किया जाता है। शो के दो सबसे सशक्त उप माध्यम हमारे पास हैं-फिल्में और धारावाहिक। वर्तमान दौर में दोनों के मानकों को देखें तो बहुत फासला दिखता है इनके कंटेंट में, इनके दृश्यांकन में, इनकी थ्योरी में। लेकिन अगर दोनों की उम्र को ध्यान में रखकर सोचा जाए तो यह तुलना बेमानी लगती है।१९१२ में देश में पहली बोलती फिल्म बनी आलम आरा। १९८६ में धारावाहिक युग की शुरूआत हुई 'हमलोगÓ से। इस हिसाब से फिल्म सौ साल का होने जा रहा है लेकिन धारावाहिक को महज २१ साल हुए हैं जनमे हुए। इसके साथ एक और बात समझ लें कि अपने देश में टेलीवुड, हमेशा से बॉलीवुड के छाया तले जीने को अभिशप्त रहा है। साफ शब्दों में कहें तो नकल इनका सबसे सशक्त हथियार है। इसलिए जब कोई फिल्म और धारावाहिक में फर्क के पहाड़ खड़े करता है तो तनिक बेचैनी होती है।फिल्म और धारावाहिक के लिए सबसे पहले और सबसे ज्यादा जरूरी चीज है पटकथा। हम देखें कि चंद्रधर शर्मा गुलेरी के 'उसने कहा थाÓ (शायद हिंदी की पहली कहानी) से लेकर ताजा कहानी बालिका वधू तक हर जगह केंद्र में लड़की है। उसने कहा था में लहना सिंह बाजार में नायिका से पूछता है 'तेरी कुड़माई हो गईÓ तो बालिका वधू में दीदीसा वधू को संगीत सिखाने का जतन करती दिखती हैं। देश के एकमात्र वैज्ञानिक फिल्म मिस्टर इंडिया भी तो महिला मोह से नहीं निकल पाई। खैर...प्रेमचंद से लेकर राजेंद्र यादव तक सबकी कहानी के पात्र स्त्री रहे हैं और ज्योंही पुरुष पात्र आता है तो महिला उसकी बैसाखी बनने के लिए तुरंत आ जाती है। तो जब कहानियों का यह हाल हो तो इससे अलग हटकर फिल्मांकन कैसे होगा। हां, मार-धाड़, सेक्स, रोमांस आदि मसाले व्यापकता से हो सकते हैं, लेकिन ेवे भोजन में सब्जी की जगह नहीं ले सकते। आप देखें कि फिल्में जब अपने बाल काल में थीं तो सत्य हरिश्चंद्र (शव्या के बिना कहानी अधूरी है), जय संतोषी मां से लेकर मदर इंडिया तक देव(हरिश्चंद्र), दानव (जय संतोषी मां टाइप फिल्म), साहूकार (मदर इंडिया) से लडऩेवाली स्त्री है। इसके बाद शुरू होता है आस्था, उप्स, चांदनी बार और फैशन का दौर। और हां, इस बीच ललिता पवार के रूप में एवरग्रीन सास का वर्चस्व देखने को मिलता है। इस सास के आगे सारी तुलसी मैया पानी मांगती हैं। और जहां तक जागर्स पार्क और नि:शब्द जैसे फिल्म की बात करें तो उसकी भौंडी नकल में एडल्ट
रोमांस यहां भी है। कभी घर एक सपना सीरियल में तो कभी रियलिटी शो के रूप में। आज की तारीख में फिल्मों में संबंधों को लेकर कुछ प्रयोग हो रहे हैं। तो धारावाहिक भी उस ओर हैं। बंदिनी में अपने से तिगुनी उम्र के दुल्हे से शादी करनेवाली संतू हो या भाग्यविधाता में पकरौवा शादी का फिल्मांकन। नकल बुरी बात नहीं है, लेकिन वह इतनी व्यवस्थित और अनुशासित हो कि कट-पेस्ट नहीं लगे। प्रयोग जारी है...





'महात्माÓ को केवल 'गुरूदेवÓ की जरूरत पड़ती है


पिछली सात मई को कवींद्र रवींद्र नाथ टैगोर की १४९वां जन्म दिन था। साहित्य के क्षेत्र में देश को एममात्र नोबेल पुरस्कार की मुस्कान देनेवाले गुरूदेव की संसद भवन में लगी आदमकद प्रतिमा से यह लगता ही नहीं कि परेशानी ने इन्हें कभी छुआ हो। पुस्तकालय भवन की ओर जानेवाले रास्ते पर गुरूदेव बैठे हैं शायद हमारे पढ़े-अनपढ़ नुमाइंदे को यह बताना चाह रहे हैं कि बिना पढ़े संसद भवन में पैर रखना घोर नैतिक पापा है। गुलाम हिंदुस्तान के अजेय योद्घा महात्मा गांधी से इसी नैतिक मुद्दे पर उनका स्वस्थ अखबारी विमर्श उस गुलामी में भी लोकतंत्र की नई-नई कोंपल फेंकता था। आज के वैयक्तिक अखबारी विमर्श के स्तर को देखकर गुरूदेव याद तो आते हैं।गुरूदेव की महत्ता इस बात में नहीं थी कि वे परम भट्टï विद्वान थे। उनकी महत्ता इस बात में भी नहीं थी कि वे युगद्रष्टा, महान साहित्यकार, दार्शनिक, संगीतज्ञ, चित्रकार, शिक्षाविद्, सामाजिक कार्यकर्ता, राष्ट्रवादी, मानवतावादी आदि विशेषणों की शोभा बढ़ाते थे। बल्कि उनकी महत्ता इसमें थी कि बापू के सहयोग के लिए सीधे साबरमती नहीं जाकर शांति निकेतन में रहकर ऐसी धुनी रमाई कि अपने आप बापू के आजू-बाजू पूरी फौज खड़ी कर हो गई। ठीक वैसे ही जैसे चाणक्य ने चंद्रगुप्त के लिए की थी। आजादी के बाद ऐसी एक ही जुगलबंदी दिखती है इंदिरा गांधी और श्रीकांत वर्मा की। वर्मा जी ने ही इंदिरा जी के लिए गरीबी हटाओ का अभेद्य नारा तैयार किया था। आज की तारीख में गुरूदेव के वंशजों में अमत्र्य सेन और रामचंद्र गुहा जैसों के नाम याद आते हैं जो हमारे सभ्यता-संस्कृति-जीवन-इतिहास की परतें खोलकर शासक के लिए नई दिशा गढ़ रहे हैं।दो शब्द गुरूदेव-महात्माआप शासक की यात्रा तय करके महात्मा हो सकते हैं लेकिन गुरूदेव की जरूरत तब भी पड़ेगी। इसलिए प्लेटो ने दार्शनिक राजा की परिकल्पना की थी। अब दोनों गुण एक व्यक्ति में विरले मिलते हैं सो कसौटी वही रही लेकिन व्यक्ति दो रहे। गुरूदेव की भूमिका कनफ्यूशियस जैसी दिखती है। अपने समय में वे भारत में वही काम कर रहे थे जो लेनिन के देश में लियो टाल्सटाय कर रहे थे। प्रकृति के सान्निध्य से ऊर्जा लेनेवाले गुरूदेव शायद अकेले महापुरुष हैं विश्व इतिहास में जिन्हें एक नहीं दो संप्रभु देशों के लिए राष्टï्रगान लिखा। इन्होंने दो देशों भारत और बांग्लादेश के लिए राष्ट्रीय गान लिखा। बचपन से कुशाग्र बुद्धि के रवींद्रनाथ ने देश और विदेशी साहित्य, दर्शन, संस्कृति आदि को अपने अंदर समाहित कर लिया था और वह मानवता को विशेष महत्व देते थे। इसकी झलक उनकी रचनाओं में भी स्पष्ट रूप से प्रदर्शित होती है। साहित्य के क्षेत्र में उन्होंने अपूर्व योगदान दिया और उनकी रचना गीतांजलि के लिए उन्हें साहित्य के नोबल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था। उन्होंने एक दर्जन से अधिक उपन्यास लिखे। इन रचनाओं में चोखेर बाली, घरे बाइरे, गोरा आदि शामिल हैं। उनके उपन्यासों में मध्यम वर्गीय समाज विशेष रूप से उभर कर सामने आया है। लेकिन गोरा सबसे विशिष्टï है। इस उपन्यास में ब्रिटिश कालीन भारत का जिक्र है। राष्ट्रीयता और मानवता की चर्चा के साथ पारंपरिक हिन्दू समाज और ब्रह्मï समाज पर बहस के साथ विभिन्न प्रचलित समस्याओं पर प्रकाश डाला गया है। इसके साथ ही उसमें स्वतंत्रता संग्राम का भी जिक्र आया है। इतना समय बीत जाने के बाद भी बहुत हद तक उसकी प्रासंगिकता कायम है। इसके अलावा जहां तक उनकी कविता का प्रश्न है तो उनकी कविताओं में अध्यात्मवाद का विशेष जोर रहा है। इसके साथ ही उनकी कविताओं में उपनिषद जैसी भावनाएं महसूस होती हैं। साहित्य की शायद ही कोई शाखा हो जिनमें उनकी रचनाएं नहीं हों। उन्होंने कविता, गीत, कहानी, उपन्यास, नाटक आदि सभी विधाओं में रचनाएं कीं। लेकिन विश्व ने उनको जाना उनकी कृतियों के अंग्रेजी में हुए अनुवाद से। इस अनुवाद का ही कमाल था कि गीतांजलि को साहित्य के नोबेल पुरस्कार के लिए चुना गया। अंग्रे्रजी अनुवाद के बाद पूरा विश्व उनकी प्रतिभा से परिचित हुआ। सात मई 1861 को जोडासांको में पैदा हुए रवींद्रनाथ के नाटक भी अनोखे हैं। हालांकि उन्हें सांकेतिक नाटक ज्यादा लिखे हैं। उनके नाटकों में डाकघर, राजा, विसर्जन आदि शामिल हैं। बचपन से ही रवींद्रनाथ की विलक्षण प्रतिभा का आभास लोगों को होने लगा था। उन्होंने पहली कविता सिर्फ आठ साल में लिखी थी और केवल 16 साल की उम्र में उनकी पहली लघुकथा प्रकाशित हुई थी। रवींद्रनाथ की रचनाओं में मानव और ईश्वर के बीच का स्थाई संपर्क कई रूपों में उभरता है। इसके अलावा उन्हें बचपन से ही प्रकृति का साथ काफी पसंद था। रवींद्रनाथ चाहते थे कि विद्यार्थियों को प्रकृति के सान्निध्य में अध्ययन करना चाहिए। उन्होंने इसी सोच को मूर्त रूप देने के लिए शांति निकेतन की स्थापना की। रवींद्र संगीत बांग्ला संस्कृति का अभिन्न अंग बन गया है। हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत से प्रभावित उनके गीत मानवीय भावनाओं के विभिन्न रंग पेश करते हैं। गुरूदेव बाद के दिनों में चित्र भी बनाने लगे थे। रवींद्रनाथ ने अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, चीन सहित दर्जनों देशों की यात्राएं की थी। सात अगस्त 1941 को देश की यह महान विभूति पंचतत्व में विलीन हो गई। लेकिन शांति निकेतन में फैलाई उनकी ज्योति अभी भी जल रही है।

पप्पू क्यों, बीबी क्यों नहीं

चुनाव आयोग ने बिना शर्त माफी मांगी अपने पप्पू वाले विज्ञापन पर, लेकिन तब तक विज्ञापन अपना काम कर चुका था। हवाएं ऐसे ५२ प्रकार की होती हैं। अभी तक इनका काम था-खुशबू/बदबू घर-घर पहुंचाना, फिर फूल के परागकण को पूरी दुनिया में छींटना जिससे इनकी संतति बढ़ती रहे। इस बार इस पगली, अल्हड़, अलमस्त हवा ने दोनों में से कोई काम नहीं किया। उसने पप्पू को घर-घर पहुंचा दिया। कोई पप्पू १९ साल का था, कोई पप्पू ५० साल का। कोई पप्पू इंंंजीनियर था तो कोई डॉक्टर और कोई डांसर। कोई पप्पू अपनी बीवी का पति था तो कोई अपनी प्यारी पिंकी का पापा। हवा के आवारापन ने इन सबको गैर जिम्मेवार थाली का जिम्मेवार बैंगन बना दिया। आशय यह कि ये जिम्मेवारी से अपनी गैर जिम्मेवारी निभानेवाले कैरेक्टर हैं। सो यह खुशबू तो हर घर जानी थी!मगर पप्पू क्योंकैडबरी एड में पहली बार पप्पू को इंट्रोड्यूस करानेवाले एडमेकर ने कहा कि उन्हें लगा कि पप्पू हमारे बीच का कॉमन नेम है, सो डाल दिया। सोचने की बात है कि ये पप्पू नामक जीव कहां जनमता है। यह महानगरों के एसीनुमा हॉल में अंग्रेजी झाड़ता मिल सकता है, मगर इसका जन्म गांव और कस्बे के सिवा कहीं नहीं हो सकता। महानगर वाले टॉम, डिक, हैरी में यकीन करते हैं। बड़े और छोटे शहर में लोग मेखला और श्रंखला जैसे नाम बना लेते हैं। ऐसे अकेले एडमेकर की क्या बिसात कि पप्पू की यह गत बनाएं, वो तो खुद इन पप्पुओं के बीबी (बिग बी) ने इसे यह कहकर लॉक कर दिया कि पप्पू पास हो गया। मानो यह दुनिया का आठवां अजूबा हो। क्या आपको नहीं लगता कि यह बीबी बिग बी नहीं होकर बिग बेवकूफ था। क्योंकि इस बीबी यानी ब्रांड ब्रेकर को आभास भी नहीं होगा कि वह अपनी इस बनिया हरकत से पप्पू समाज को हिकारत का पात्र बना देगा। आप खुद देखें कि दूसरे बीबी यानी बुरे बदमाश ने एक पैरामीटर सेट कर दिया कि पप्पू कांट डांस साला। उसे लड़की चाहिए तो डांस करना सीखना पड़ेगा। आज आप देखो कि लड़की सिर्फ पैसे मांगती है जो कि उसके पप्पू के पास है! लेकिन हद तो कर दी नए बीबी ने यानी बड़े बदमाशों ने। इस श्रेणी में वे सारे हैं जिनकी रोजी-रोटी-बेटी का जरिया इंग्लिश है। इनका मानना है कि पप्पू गैर जिम्मेवार इंसान है। पप्पू की हालत पर एक शेर याद आता है 'जहां बेदर्द हाकिम हो, वहां फरियाद क्या करना।Ó पप्पू जहां-जहां अपने दर्द की शिकायत कर सकता है, सब जगह बीबी बैठे हैं। चुनाव आयोग से लेकर देश को चलानेवाले हर चौक-चौराहे पर। काम इनके पप्पू से भी बदतर हैं लेकिन ये तो बीबी हैं कोई पप्पू नहीं। बीबी को फर्क नहीं पड़तापप्पू की बीवी को चाहे रात में नींद नहीं आती हो, लेकिन बीबी के बाकी फुल फार्म (बिग बी, ब्रांड ब्रेकर, बुरे बदमाश, बड़े बदमाश आदि) चैन से मुफ्त की कैडबरी खाते हैं और पेप्सी का कुल्ला करते हैं, सफाई के नाम पर जंगल साफकर अपना फार्म हाउस बनवाते हैं, एसी गाड़ी से चलते हैं ताकि सीधा ग्रीन हाउस गैसें छोड़ सकें। क्योंकि ऐसी कोई हवा नहीं जो इस गैस को सीधे किसी बीबी के घर में पहुंचाए। लंका दहन के समय तीन हवाएं (शीतल, मंद, सुगंध) पूरी लंका में नहीं चल रही थीं, लेकिन इस ग्रीन हाउस गैस की आग की लपट में झुलसती दुनिया में ये तीनों हवाएं केवल इन बीबी के घर में बह रही हैं।

ये तो होना था...

गोल्ड स्मिथ से लेकर जब हम अमत्र्य सेन औैर डॉ युनुस खान तक आए तब तक विकास की कई परिभाषाएं जनमकर, पनपकर आपस में ऐसी उलझीं कि हमें विकास के बजाय विकास के न्याय की बात करनी पड़ गई। बचपन में अरावली, शिवालिक, विंध्याचल की पहाडिय़ों के जिक्र बड़े चाव से पढ़ता था और जब टीचर पूरे सुर-ताल में कहते थे-'सतपुड़ा के घने जंगल, नींद में डूबे हुए, ऊंघते-अनमने जंगलÓ तब यह बात समझ से परे थी कि जंगल को नींद कैसे आएगी। आज फरीदाबाद और गुडग़ांव के कई चक्कर लगाने के बाद इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि सतपुड़ा का पता नहीं, मगर दिल्ली की सीमा पर मेवात, गुडग़ांव और फरीदाबाद को पानी देनेवाली अरावली के जंगल तो मर रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार विकास के नाम पर चल रही खुदाई की वजह से इस इलाके का भू जल-स्तर ३०० मीटर नीचे जा चुका है। आप यह न सोचें कि यह मामला सीधे तौर पर आपकी जिंदगी और राजनीति से नहीं जुड़ा है। फरीदाबाद और गुडग़ांव के बीच फंसे दक्षिण दिल्ली के इलाके (बदरपुर से लेकर महरौली तक का १३ किलोमीटर का इलाका १२ महीने सूखा रहता है) में वह दिन दूर नहीं जब पानी को लेकर मर्डर होंगे। वहां के विधायकों और सांसद अभी तक इस समस्या का हल नहीं कर पाई, सरकार भी शायद सोई रही तो अब जाकर न्याय के मंदिर (सुप्रीम कोर्ट) ने अपना घंटा बजाकर चारों ओर मुनादी करवा दी है कि इस इलाके में अब कोई खनन कार्य नहीं होगा।हरियाणा के अरावली हिल्स रेंज में पर्यावरण को गंभीर नुकसान का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि असाधारण हालात में असाधारण उपायों की जरूरत होती है। यह पाबंदी हरियाणा के गुडग़ांव, फरीदाबाद और मेवात जिलों के करीब 448 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में लागू होगी। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय राजधानी की पांच किलोमीटर की परिधि में खनन पर पाबंदी लगाई थी। कोर्ट ने ८ मई के अपने फैसले में कहा कि इलाके में पर्यावरण और खनन से जुड़े कानून के एक भी प्रावधान का पालन नहीं किया गया। सैटलाइट इमेज दिखाते हैं कि बड़े स्तर पर खुदाई के कारण भारी नुकसान हुआ है। इसलिए अब इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती। लेकिन मुद्दा यह नहीं है कि न्याय के मंदिर को अपना 'राजदंडÓ इस्तेमाल करना पड़ा। मुद्दा यह है कि इस मंदिर ने राजदंड उठाने का कारण क्या बताया। कारण यह बताया गया कि 'माइनिंग टिकाऊ विकास के सिद्धांत के तहत है, पर इसे संतुलन के सिद्धांत के तहत भी देखना होगा।Ó माइनिंग टिकाऊ विकास के सिद्धांत से आगे जाकर हो तो यह पाबंदी के सिद्धांत तहत आती है। यह हदों का मामला है। कहने का आशय यह कि टिकाऊ विकास (डवलपमेंट) जरूरी है मगर सततीय विकास (सस्टेनेबल डवलपमेंट) की कीमत पर नहीं। देश भर में ऐसे ही हरित प्रदेश की कमी होती जा रही है। परिणाम भू जल का स्तर नीचे जा रहा है। शहरों में लोगों को पीने का पानी नहीं मिल रहा है। ऐसे भी माइनिंग का पर्यावरण संरक्षण के साथ संतुलन और माइनिंग पर पाबंदी एक ही सिद्धांत के दो पक्ष हैं। बीते सालों में सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण संरक्षण के जरिये माइनिंग को संतुलित करने की कोशिश की है। हालांकि 2004 में ही यह पाया गया था कि नियमों का पालन नहीं हो रहा है, इस कोर्ट ने मौजूदा माइंस के लिए नियमों के पालन पर जोरदार चेतावनी जारी की थी, जिसका मतलब यह नहीं था कि टिकाऊ विकास के सिद्धांतों पर पाबंदी लगा दी गई। हालात सुधरने की जगह बिगड़ गए। कोर्ट को ज्यादा व्यापक नजरिये से देखना पड़ा। कोर्ट ने पहले ही कहा था कि अगर पर्यावरण के नुकसान जारी रहा और उस हालात पर पहुंच जाए जहां से लौटा नहीं जा सकता तो माइनिंग पर पाबंदी के लिए विचार किया जा सकता है। हुआ भी यही। इसी का डर था। इसी की आशा थी। डर उनलोगों के हिस्से का था जिन्हें इस खनन से प्रत्यक्ष फायदा था, आशा उनलोगों को थी, जिन्हें इससे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों फायदे मिलने थे। चाणक्य नीति में एक जगह चर्चा है कि नदी के पानी पर, किनारे रहनेवाले का स्वाभाविक हक है। सो अरावली की पहाडिय़ों की ताजा हवाओं और जल पर फरीदाबाद, मेवात, गुडग़ांव सहित बदरपुर-महरौली की सीधी पट्टïी का प्रथम हक होना चाहिए। हालांकि कोर्ट के डिसीजन में स्थानीयता का जरा भी पुट नहीं दिखता, लेकिन अगर सततीय विकास को लक्ष्य कर किए गए फैसले में स्थानीय जनाकांक्षा शामिल हो तो क्या कहेंगे। यही कि... ये तो होना था।

चाहे जितनी मंदी हो, घर और शराब तो चाहिए...

चीजों को जितनी बार बदलो, वह अपनी पुरानी शक्ल की ओर लौटने लगती है। भौतिक जिंदगी के दो सबसे बड़े सच-घर और शराब (जरूरत और शौक)- के लिए, आदि काल से व्यक्तिजन्य समाज अपने लिए उपलब्ध कराता रहा है। पहले होती थीं हवेलियां। सुनने में अच्छा लग रहा होगा। इसके भीतर का सच ये था कि उस हवेली के सभी बेटों के लिए एक कमरा नहीं होता था। सो जिसकी बीवी मायके रहती थी, उसे बाहर सोना पड़ता था। उसके हिस्से के घर में नया जोड़ा सोता था। सास इस बात का पूरा ख्याल रखती थीं कि हवेली में जितने कमरे उपलब्ध हैं, उतनी बहुएं ही हवेली में रहेंगी, बाकी किसी-न-किसी बहाने मायके भेज दी जाती थीं। यह था तब का फ्लैट मैनेजमेंट। दूसरे, आपने सुना होगा कि प्राचीन काल में यज्ञ में 'सोमÓ का हव्य हर देवता के हिस्से चढ़ाया जाता था। यह सोम और कुछ नहीं बल्कि तब के जमाने की तकनीक के हिसाब से बनी उत्कृष्टï किस्म की शराब थी जिसे इंद्रादि देवता ग्रहण कर जाते थे। इसमें इंद्र चोरी से दूसरे के हिस्से का सोम भी पी जाते थे। इसी से तुलसीदास कहते हैं 'मधवा (इंद्र) महामलिनÓ।उपर्युक्त भूमिका की जरूरत इसलिए पड़ी कि तब से आज तक गंगा में इतना पानी बहा कि वह सूखने को चली। ज्वाइंट फैमिली से न्यूक्लियर फैमिली बन गई। तब की हवेलियों की दीवारें घिसकर पहले घर, फिर फ्लैट और अब नैनो फ्लैट। यानी पहले एकड़ में बनने वाला घर अब ४५ गज के प्लॉट पर बनेगा। १० बाई १० या १० बाई ८ के आकार का यह फ्लैट सिर्फ आपको लेटने और सोने की आजादी देगा। आपका घर आपकी तरह सांस नहीं ले सकेगा। आप खुद सोचें कि इस मंदी की हालत में भी देश को लगभग ढाई करोड़ मकानों की जरूरत है जबकि उधर ब्रांडी, रम, व्हिस्की की बिक्री सालाना करोड़ों पेटियों में हो रही हैं। केवल मैक्डोवेल ब्रांडी की बिक्री पिछले साल ८० लाख पेटी हुई है। एक पेटी में १२ बोतल। या यूं कहें कि ९ लिटर शराब। नैनो फ्लैट जब आएगा जब आएगा तब देखा जाएगा मगर फिलहाल आप यह जानें कि शराब के शाहंशाह विजय माल्या की शराब कंपनी यूएसएल और उसकी सहायक कंपनियों ने मिलकर इस वित्तीय वर्ष में १.५ करोड़ पेटी शराब ज्यादा बेची। यानी लगभग १४ करोड़ लिटर ज्यादा शराब। आनेवाले पांच सालों में १० करोड़ नए वोटर (आप बेरोजगार समझें) होंगे यानी लगभग ५ करोड़ फ्लैट्स (मान लें कि स्त्री-पुरुष अनुपात बराबर है) और कम-से-कम १५ करोड़ लिटर शराब (मानें कि मंदी के असर के बावजूद एक परिवार में हस्बैंड-वाइफ के जन्म-दिन और शादी के दिन एक लिटर शराब की खपत होगी) की डिमांड होगी। इस कमजोर हिसाब-किताब के बावजूद शुरूआती तौर पर इतना तो पता है ही कि घर और शराब, जीवन रक्षक दवा की तरह हैं जिस पर नही चाहते हुए भी आपको खर्च करना पड़ेगा। माना कि आप नहीं पीते लेकिन शादी की सालगिरह पर अपने दोस्त को तो पिलाएंगे न। बात बराबर है!अब आइए देखते हैं कि शराब कंपनियों और घर-कंपनियों की गिद्घ नजर क्या कहती है इस बारे में। रीयल इस्टेट कंपनियां बड़ी तादाद में ऐसे फ्लैट तैयार करने में लगी हैं जो टाटा के नैनो फ्लैट की तर्ज पर कम मार्जिन पर घर बेचेंगी। क्योंकि मार्जिन भले ही कम हो लेकिन फ्लैट की तादाद ज्यादा हो तो मुनाफे पर उतना असर नहीं पड़ेगा। याद रखें 45-45 गज के मकान बनाकर अगर पांच-साढ़े पांच लाख में बेचे जाएं तो कंपनी के मुनाफे पर खास असर नहीं पड़ेगा। हां, 'छिपी बेरोजगारीÓ के शिकार रोजगार प्राप्त लोग इस नए स्लम में जरूर रह सकेंगे। और जहां तक मार्केट के्रडिबिलिटी का सवाल है तो यही एकमात्र फॉम्र्यूला है जिससे बड़े बिल्डरों और रियल्टी कंपनियों पर प्रॉपर्टी बाजार में बुलबुला बनाने का दाग भी मिट सकेगा और पूरे रियल्टी सेक्टर की विश्वसनीयता फिर से बहाल हो सकेगी। भारत में मकानों की मांग और आपूर्ति के बीच जो बड़ी खाई है वह सस्ते फ्लैटों से काफी हद तक भर जाएगी। दूसरी तरफ शराब के बादशाह विजय माल्या के वचन सुनें। वे कहते हैं कि ब्रांडों को नया रूप-रंग देने के लिए कंपनी ने रोमानोव रेड के नए ब्रांड नाम के साथ नया प्रेस्टिज वोदका, व्हाइट एंड मैक्के स्पेशल का रेग्युलर स्कॉच और छोटे पैकों में ब्लैक डॉग को बाजार में उतारा। हमने अपने एंटिक्विटी रेंज, रॉयल चैलेंज, मैकडॉवेल्स नंबर वन और ब्रांडी की पूरी रेंज को भी नया रूप दिया। मूल जोर छोटा पैक, फिक्स प्राइस और ज्यादा मुनाफा पर है। क्योंकि कोई भी मंदी ज्यादा-से-ज्यादा यही कर सकती है कि गाड़ी नहीं खरीदने देगी, लेकिन एक दिन के किराए पर गाड़ी का सुख तो देगी ही। और अगर इससे ईगो हर्ट हो तो नैनो पैक है न!

तुम कौन हो

तुम कौन हो
बीआरटी कॉरिडोर की बस हो या
धौला कुआं ओवरब्रिज पर चलती इनोवा
ट्रांस यमुना की सड़क पर हिचकोले खाती ब्लूलाइन
या रोहिणी की कॉलोनियों में १० रूपए की रिक्शा
तुम कौन हो
किचन की 'प्रगति हो
सास-बहू सीरियल की सास हो
नच ले विद सरोज खान की सरोज हो
कि होंठ रसीले वाली मलाइका अरोड़ा
तुम कौन हो
कल्पना चावला की मां हो
कि उसकी कल्पना से आईपिल्स खाती हो
बोलो, चुप क्यों हो
कहीं ऐसा तो नहीं कि
शंकराचार्य को हराने के बाद तुम चुप हो गईं
कौन हो तुम
एक गोद में लैपटॉप, दूसरे में बेटा
घर लौटो तो बिस्तर पे पति
दिन में काम-पुत्र, रात में काम-पति
तुम कौन हो
जब कपड़े का आविष्कार न हुआ था
पिता के कहने से परशुराम ने काटा था सिर
आज बिना पूछे मारते हैं थप्पड़
कौन हो देवि
सुना है ब्रह्म, विष्णु, महेश को दूध पिलाया तुमने
फिर आज फिगर की फिकर करती हो
तुम कौन हो

Monday, May 4, 2009

लिपस्टिक के साथ वोट क्यों नहीं है फैशन में

महानगरों में बहुत तरह की महिलाएं रहती हैं। मसलन सड़क पर झाड़ू लगाने वाली और घर में बर्तन साफ करने वाली से लेकर पेज थ्री पार्टी में सुर्ख लाल लिपस्टिक और उजले बालों वाली लेडीज तक। अच्छा, यहां की एक और खासियत होती है। पूछो क्या? उपर्युक्त वर्णित महिलाओं और लेडीज के घरों में आय के हिसाब से टीवी है, केबल लाइन भी है। यानी इस बात की पूरी छूट है कि लेडीज गुड टाइम्स पर शिल्पा शेट्टïी को योगा सिखाते देख गुस्से से जलें, फैशन शोज देखकर अपनी बॉडी शेप को आईना में देखें, जूम पर पेज थ्री पार्टी देख अपने किसी को फोन करके पूछें कि उन्हें क्यों नहीं बुलाया..., और झाड़ू लगानेवाली महिलाएं गिलास में चाय पीते हुए 'रसिक बलमाÓ वाला कोई फूहड़ गाना सुनकर स्त्री-आजादी के अलौकिक एहसास से भर जाएं।जिस घर में टीवी घुस गया है, उस घर की यह लाइफ स्टाइल हो गई है। लेकिन तब लाख टके का सवाल है कि टाइट फिटिंग की ड्रेस पर लो कट ब्लाउज (ये महिला-लेडीज दोनों का प्रिय फैशन है, क्योंकि यह उन्हें फ्री होने का एहसास कराती है) का फैशन जीनेवाली महिला/लेडीज के फैशन स्टेटमेंट में अभी तक वोट करना क्यों नहीं आ पाया है?ऐसे ये महिलाएं और लेडीज वोटिंग और सेक्स को लेकर एक राय रखती दिखती हैं। अपने ऑब्जर्वेशन में मैंने देखा है कि गांव से शहर और फिर महानगर तक जब तक ये लड़कियां और गल्र्स होती हैं, वोट और सेक्स को लेकर एक-सा एक्साइटमेंट रखती हैं। मसलन मम्मी/मां किचन में परेशानी का बहाना मार सकती हैं लेकिन ये (लड़कियां/गल्र्स) पापा का हाथ पकड़ वोट की लाइन में कुछ इस एहसास के साथ लगती हैं कि देखो, पुरुषो!, यहां भी मैं तुम्हारे साथ हूं। हालांकि इस बात से बहुतों को आपत्ति हो सकती है, लेकिन सिर्फ उन्हें तीनों जगहों की लड़कियों/महिलाओं या गल्र्स/लेडीज के जीवन को नजदीक से नहीं देखा है। ज्यों ही ये लड़कियां/गल्र्स, महिला/लेडीज में कन्वर्ट होती हैं, उनका इतना एक्सप्लोरेशन या कहें कि एक्सप्लायटेशन हो जाता है कि उनमें एक अजीब किस्म का ' दार्शनिक नकार भावÓ आ जाता है, जैसे दो-तीन बच्चे जनने के बाद या ४०-४५ की उम्र के बाद उनमें सेक्स के प्रति अजीब किस्म का नकार भाव आ जाता है। अब यहां नकार के भी दो अलग-अलग कारण हैं। महिलाएं समझने लग जाती हैं कि बच्चे हो गए सो अब सेक्स की क्या जरूरत?, जबकि कुछ किताबें पढ़ लेने के कारण लेडीज समझने लग जाती हैं कि बेवजह का 'घावÓ क्यों लिया जाए। बल्कि वे तो एक कदम आगे बढ़कर इस मुकाम पर पहुंचने के बाद, लेस्बियन/गेइज्म और एक्सट्रामैरिटल अफेयर्स के अंतहीन प्रवचनों में लीन हो जाती हैं।परिणाम यह कि जैसे सेक्स से विरक्ति, वैसे वोट से। अगर विधानसभा, लोकसभा चुनाव और उपचुनावों को जोड़ दिया जाए तो तकरीबन हर छह महीने में देश में चुनाव होते हैं, लेकिन चैनल, अखबार उसे महिलाओं-लेडीज तक पहुंचा ही देते हैं। यहां मीनोपॉज से ठंडी पड़ी लेडीज देखती है कि उसके ड्राइंग रूम में दो तरह की चर्चा हमेशा होती है- 'सेक्स और चुनावी राजनीतिÓ। सो उन्हें दोनों से खास किस्म की नफरत होने लगती है जो बाद में विरक्ति में बदल जाती है। घाघ राजनेता इस सच को बारीकी से पहचानते हैं इसलिए दिल्ली में जीत की हैट्रिक लगाने वाली महिला मुख्यमंत्री होने के बावजूद यहां इस बार भी महिला मुद्दा नहीं है। तो जब वह केंद्र में ही नहीं है तो वह जोश कहां से लाए, जो २० साल की उम्र में उनमें खुद-ब-खुद आ जाता था। अब तो उसने हर बात पे हारना सीख लिया है। महिला आरक्षण बिल इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। सिर के बाल नहीं नोंचते हुए आप ये समझें कि वोट नहीं करके, कहीं गहरे
इनके चोटिल अहं को मरहम मिलता है। शायद...

इन दिनों क्या कर रहे हैं सोप और रियलिटी शोज

टेलीविजन इंडस्ट्री के लिए पिछले एक महीने से कुछ भी अच्छा नहीं घट रहा है। बालिका बहू जैसे सीरियलों ने कुछ उम्मीद दिखाई थी कि चुनाव सिर पर आ गया और आईपीएल तो पहले से था ही। यानी एक तो करेला, दूजे नीम चढ़ा। दोनों ने मिलकर धारावाहिकों और रीयल्टी शो की हवा गुम कर रखी है। लगता नहीं है कि इस महीने भी टेलीविजन धारावाहिकों को इससे निजात मिल पाएगी।हालांकि न्यूज चैनलों पर सोप के डाइरेक्टर इस बात से इंकार करते हैं कि आईपीएल उन्हें नुकसान करेंगे या कर रहे हैं। लेकिन उन्हें पता नहीं है शायद कि न्यूज चैनलों ने मैच के दौरान और बाद में अलग-अलग स्पोट्र्स शो शुरू कर दिए हैं और इतना तो सभी जानते हैं कि जो लोग मैच देखना पसंद नहीं करते वे मैच के नाम पर न्यूज चैनलों में हो रहे तमाशे को बहुत एंज्वाय करते हैं। सो आजकल टीआरपी की कोई बात नहीं कर रहा है। हालांकि सोप निर्माता केवल उस खबर से खुश होना चाहते हैं कि पिछले साल आईपीएल टूर्नामेंट के पहले मैच की टीआरपी थी ८.२१ जबकि इस बार पहले मैच को ५.५ टीआपी मिली। लेकिन यहां देखने लायक बात यह है कि पिछली बार पहला ही मैच सबसे हाई पिच पर खेला गया था, इस बार एक हफ्ते बाद हाई पिच गेम देखा गया। जैसे कोलकाता नाइट राइडर्स का सुपर ओवर में हारना, युवराज की पहली आईपीएल हैट्रिक और फिफ्टी के बावजूद पंजाब किंग्स इलेवन का हार जाना। सो आईपीएल और चुनावी फीवर हाई होता गया, सोप तथा रीयल्टी शो का फीवर डाउन होता गया। इससे बचने के लिए देखें कि किस स्तर पर क्या-क्या तैयारियां चल रही हैं।रीयल्टी शो ने शुरू किया फूहड़ भाषा का खेलथर्ड ग्रेड फिल्मों से प्रभावित ये रीयल्टी शो आज की तारीख में हद दर्जे की फूहड़ भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं ताकि कुछ दर्शक जुटाए जा सकें। उदाहरण के तौर पर सोनी पर आ रहे कॉमेडी सर्कस को लें। श्रुति इसकी एंकर हैं और पटना साहिब से बिहार बाबू को टक्कर दे रहे शेखर सुमन इससे जज। साथ में अजय जडेजा भी। इसके पिछले कार्यक्रम की थीम थी-'भूतÓ। अब देखें कि एक भूतनी कहती है- 'आज कल के भूत बड़े ठड़की हो गए हैं।Ó क्या परिवार के साथ बैठकर आप देखेंगे? शायद यह इनकी बदहवासी का नतीजा है।आईपीएल शो लाइव और फ्रीमोबाइल पर एक एसएमएस आया कि दिल्ली के वसंत कुंज स्थित डीएलएफ प्लेस के हब में आउटडोर स्क्रीन पर मैच का लाइव प्रसारण किया जा रहा है। यहां उत्तम भोजन के बढिय़ा प्रबंध के साथ स्टेडियम एक्सपीरिएंस का पूरा-पूरा ख्याल रखा गया है। लेकिन पास फ्री। सोचिए इन सोप्स का क्या हो रहा होगा।प्राइवेट खिलाडिय़ों की छोटे शहरों में पहुंचआईपीएल को टारगेट कर बिग टीवी जैसों ने टीयर टू और टीयर थ्री शहरों को टारगेट किया है। २५० रूपए प्रति महीने के ऑफर के साथ ये दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों के अलावा ५०० शहरों में अपनी सेवा देनी शुरू कर दी है। अच्छा, मैच की मलाई काटने के लिए इन्होंने वहां के ग्राहकों को ऑन दि स्पॉट सेवा देनी शुरू की है ताकि मैच के दौरान ग्राहकों को किसी तरह की पेरशानी नहीं हो, वरना न्यूज शो और सोप्स पर स्विच
करने में उन्हें कितना समय लगेगा।पुरुष भारी पड़ रहे हैं स्त्रियों परसोप्स की टारगेट व्यूअर महिलाएं हैं। लेकिन आईपीएल और चुनावी बहसें देखने के लिए वे रात ८-११ बजे का टाइम प्रेफर करते हैं, ताकि चाय पीते हुए ऑफिस की थकान उतारी जा सके। इसलिए रात का समय तो बुक है। बचा दोपहर का रिपीट टाइम, तो इस समय तपती गर्मी ने ज्यादातर घरों से दोपहर को बिजली गायब कर दी है। इससे बचा-खुचा चांस भी खत्म। अब तो बच्चे भी मैच के दीवाने हैंपिछली बार की रिपोर्ट थी कि लगभग ४२ प्रतिशत लोगों ने आईपीएल के मैच देखे। यानी उतने फीसदी दर्शकों ने सोप्स नहीं देखे। इस बार इससे भी खतरनाक स्थिति यह है कि आजकल बच्चे शिन चान जैसे कार्टून कैरेक्टर की बहस छोड़कर गिलक्रिस्ट के छक्के और युवराज की हैट्रिक की चर्चा में शाम को खेलने भी निकल रहे घर से बाहर। तो समझें कि इस बार लगभग आधे लोग आईपीएल और बाकी चुनाव देखेंगे। आने वाले दिनों में टीआरपी की रिपोर्ट इस बात की तस्दीक करेगी।

१० पैसे में १ ईमेल पढऩे को मिले तो...


तो साइबर कैफे की आमदनी बहुत घट जाएगी और क्या! लेकिन यह संभव कैसे होगा? बस एक अकाउंट खोलना होगा द्वशड्ढद्गद्ग.द्बठ्ठ पर। इसके बाद अगर आप रोजाना एक रूपए शुल्क खर्च करते हैं तो रोज अपना १० ईमेल पढ़ सकते हैं अपने मोबाइल पर। यानी ३० रूपए महीना चार्ज। लेकिन ७९ रूपए में महीने भर अनलिमिटेड ईमेल एक्सेस कर सकते हैं। यह राशि आप कैश, चेक या क्रेडिट/डेबिट कार्ड से पे कर सकते हैं, लेकिन पेमेंट में देरी होने पर मोबाइल की टॉक वैल्यू से एक भी पैसा नहीं कटेगा।यह सेवा किसी भी सेलफोन पर यहां तक कि बेसिक ब्लैक एंड व्हाइट मोबाइल पर भी उपलब्ध होगी क्योंकि इस सेवा के लिए किसी जीपीआरएस, वैप या हाई फाई कनेक्शन की जरूरत नहीं। तकनीक का असली कमाल ये है कि ईमेल मोबाइल पर एसएमएस की तर्ज पर दिखेगा और ४८० कैरेक्टर तक पढऩे की सुविधा देगा। यानी ऑनलाइन पत्र का मजमून आप आसानी से समझ सकेंगे। आइए, जानते हैं इसकी अन्य विशेषताएं।मोबीडॉटइन पर आईडी खोलेंमोबीडॉटइन पर अपना ईमेल एकाउंट खोलें। फिर अलग-अलग ईमेल अकाउंट पर अपना मोबी आईडी फॉरवर्ड करें। इसके बाद जब भी कोई ईमेल आपके मेल बॉक्स में आएगी, यह तुरंत ट्रांसफर हो जाएगी आपके मोबी अकाउंट में और वहां से मोबी इसे आपके सेल पर ट्रांसफर कर देगी। ईमेल बन जाएगी एसएमएसचूंकि इस सेवा के लिए जीपीआरएस, वैप या वाई फाई सुविधा की जरूरत नहीं होती सो ईमेल पढऩे का एक ही रास्ता बचता है और वह है आपका मैसेज बॉक्स। मोबी किसी भी ईमेल को एसएमएस की शक्ल में भेजती है मोबाइल पर। इससे अब किसी को यह शिकायत नहीं होगी कि यार नेट बहुत स्लो है, ईमेल नहीं खुल रही। यानी बैंडविथ या स्पैक्ट्रम स्पीड के झंझट से छुटकारा।ईमेल का जवाब भी दे सकते हैं आपमोबी आपको किसी भी मेल आईडी की तर्ज पर रीड, रीप्लाय, रीप्लाय ऑल और सेंड आदि की सुविधा देती है। साथ ही आप किसी डॉक्यूमेंट को अटैच करके भी भेज सकते हैं। डॉक्यूमेंट अटैच करने पर आपको अटैचमेंट नंबर या कोड मिलेगा। मेल करते समय आपको उस खास कोड का उल्लेख करें ताकि रिसीवर अपने कंप्यूटर या लैपटॉप पर उस कोड पर क्लिक करके आपके भेजे गए अटैचमेंट को खोल सके। ४८० कैरेक्टर्स तक मेल पढ़ सकते हैं आपहर मेल १६० कैरेक्टर्स के तीन पैकेट्स में आपको दिखेगा। यह सीमा इसलिए है कि कहीं एक ही मैसेज से पूरा मैसेज बॉक्स न भर जाए।स्पैम को रोकने का ऑप्शन है यहांज्यादा स्पैम मैसेज की भरमार नहीं हो जाए, इसके लिए मोबी अकाउंट खोलते समय मेन ईमेल अकाउंट में संदेहास्पद आईडी को या तो ब्लॉक कर दें या फिर ब्लैकलिस्ट करें। इसके बाद आप जरूरी ईमेल आईडी को व्हाइटलिस्ट में डाल दें। इससे मोबाइल के मैसेज बॉक्स में सिर्फ व्हाइट लिस्टेड ईमेल ही आएंगी।यूजर सबसे बड़ा राजा हैइसलिए इस सेवा में आप ज्यों ही स्टॉप का एसएमएस मोबी को भेजेंगे, मोबाइल पर मैसेज आना बंद हो जाएगा और जरूरत पडऩे पर स्टार्ट का एसएमएस मोबी को भेजने पर नई ईमेल के साथ पहले की पेंडिंग पड़ी सभी ईमेल्स देख सकेंगे।

सपनों का घर आया आपके मोबाइल परमोबाइल पर

नेट की सुविधा ने सारी गड़बड़ कर दी। पहले आप सपनों के घर की तलाश में एजेंटों के चक्कर लगाते थे, बाद में साइबर कैफे या फिर ऑफिस में बॉस की नजर चुराकर प्रॉपर्टी की अलग-अलग साइट सर्च करते थे। और बॉॅस से बचना है तो अपना लैैपटॉप रखिए। मतलब ढोने का झंझट अलग से और मंदी की मार तो है ही। सो घर की तलाश कर रहे लोगों के घर तक सीधे पहुंचने के लिए मोवीसोक और ९९ एकडड़ॉटकॉम दोनों मिलकर उनके मोबाइल तक पहुंच गए हैं। यानी ये कि अब होम सीकर्स बीवी के साथ आराम से बैठकर आपस में डिस्कस करते हुए मर्जी का घर ढूंढ़ सकते हैं।कैसे करेंगे इंस्टॉलइसके लिए आपको अपने मोबाइल से ५६३०० पर एसएमएस करना होगा-'९९Ó। यह ९९ एकडड़ॉटकॉम का शॉर्ट फॉर्म है। या फिर द्धह्लह्लश्च://द्वशड्ढद्बद्यद्ग.९९ड्डष्ह्म्द्गह्य.ष्शद्व के लिंक पर अपना मोबाइल नंबर फीड कर दें। लेकिन इसके लिए आपके मोबाइल में जीपीआरएस कनेक्शन की सुविधा होनी चाहिए। एक बार आपके जीपीआरएस कनेक्शन से ९९ एकडड़ॉटकॉम का लिंक जुड़ गया, फिर आप बड़े आराम से एप्लीकेशन डाउनलोड कर लें अपने मोबाइल पर। इंस्टालेशन के बाद आप कभी भी अपने मोबाइल के च््रश्चश्चद्यद्बष्ड्डह्लद्बशठ्ठह्यज् या च्द्व4 श2ठ्ठज् फोल्डर से एक्सेस कर सकते हैं।कैसे ढूंढेंगे घरमेन मीनू में जाने के बाद तीन ऑप्शंस मिलेंगे- सर्च, चेक और पोस्ट। आप अपनी जरूरत के हिसाब से ऑप्शन क्लिक करें और उसके अनुसार आगे बढ़ें। इसके बाद आप मोबाइल के स्क्रीन पर ही अपने बजट, च्वॉइश और शहर के अनुसार प्रॉपर्टी की डिटेल्स प्राप्त कर सकते हैं। अच्छा इसमें खरीदने या किराया दोनों की सुविधा है। इस सुविधा की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि इस एप्लीकेशन के जरिए बिल्डर या ब्रोकर से संपर्क कर सकते हैं, लेकिन उस बिल्डर या ब्रोकर का अकाउंट इस साइट पर होना जरूरी है। आपकी डिमांड की प्रॉपर्टी इस साइट पर उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी फिर इनकी है। मोबीटेक तकनीक और ९९ एकर्सडॉटकॉम की जुगलबंदीइस जुगलबंदी ने मोबाइल पर प्रोपर्टी सर्च करने के लिए 'वैपÓ एप्लीकेशन मुहैया कराया है। इससे मोबाइल पर बिल्डर्स, ब्रोकर्स और बायर्स तीनों की ऑनलाइन मीटिंग संभव है। इससे कामकाजी लोगों का समय और पैसे दोनों बचने की पूरी संभावना नजर आती है।

आम निवेशकों का ख्याल करती नई पेंशन योजना

मंदी के दौर में आम उपभोक्ता/कामगार के लिए शेयर मार्केट की गति समझ से परे है। ऐसे में एक मई से देश भर में चालू नई पेंशन योजना (एनपीएस) सुखद एहसास की तरह है। हालांकि नए सरकारी कर्मचारी इसका लाभ ले रहे थे लेकिन अब सभी सरकारी, गैर सरकारी कर्मचारी इसका फायदा उठा पाएंगे। कैसे यह सबकी मददगार है यह तीन स्तर पर निवेशक के पैसे की सुरक्षा करता है-ई क्लास, जी क्लास और क्लास सी। साधारण भाषा में कहें तो इक्विटी, सरकारी प्रतिभूतियां और निश्चित आय जैसे कि बैंकों की एफडी। ज्यादा जानकारी के लिए आप पीएफआरडीए.ओआरजी.इन पर संपर्क किया जा सकता है। ई क्लास- इसमें ज्यादा जोखिम पर ज्यादा मुनाफे की व्यवस्था है। लेकिन इसके लिए अपने पैसे को इंडेक्स फंड में निवेश करना होगा।जी क्लास- इस कैटेगिरी में केंद्र और राज्य सरकारों के बांड शामिल हैं। यानी इसके डूबने की आशंका तो कतई नहीं।सी क्लास- इनमें बैंकों की फिक्स डिपोजिट योजना के अलावा असेट मैनेजमेंट कंपनियों के फंड शामिल हैं। यानी कि इससे भी निश्चित ब्याज दर पर वापसी की पूरी उम्मीद है।निवेशक चाहें तो इन तीनों ऑप्शंस को नकार सकते हैं, इस स्थिति में उन्हें ऑटो च्वाइस ऑप्शन में ट्रांसफर कर दिया जाएगा।हालांकि बीते वित्त वर्ष में इन तीनो फंडों का मिला-जुला सालाना रिटर्न रहा है १४.५ फीसदी। इस हिसाब से तो यह बहुत लाभकारी दिखता है लेकिन यह पीएफ की तरह तयशुदा रिटर्न वाली स्कीम नहीं है। क्योंकि इसका पैसा शेयर, सरकारी बॉण्ड और कॉरपोरेट बॉण्ड में अलग-अलग अनुपात में लगाया जाएगा। सरकार ने फंड मैनेज करने का काम 6 कंपनियों को सौंपा है। इसके अलावा पेंशन फंड एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी की एक्सरे नजर से भी उन्हें गुजरना होगा। इस स्कीम का फायदा कब होगा एनपीएस 58 साल की उम्र के बाद फायदा देगी। बीच में पैसा नहीं निकाला जा सकता। हालांकि यह तय करने का हक खुद निवेशक को होगा कि तीनों विकल्पों में से किसमें कितना पैसा लगे, लेकिन अगर निवेशक की संतुष्टिï है तो यह काम इस पेंशन योजना के फंड मैनेजर करेंगे। निवेशक के कुल निवेश का अधिकतम 50 फीसदी ही शेयर में लगाया जा सकता है। इससे निवेश के डूबने का खतरा नहीं रहता।द्वि स्तरीय व्यवस्था है इसमेंपहले स्तर में पेंशन योजना के अंतर्गत ५८ वर्ष की उम्र से पहले निवेशक अपना पैसा नहीं निकाल सकता, ेलेकिन दूसरे स्तर में बीच में भी निवेशक अकाउंट से पैसे निकाल सकता है। इसे छह महीने बाद लागू किया जाएगा।अकाउंट कैसे खुलेगा इस स्कीम का सारा हिसाब-किताब नेशनल सिक्युरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड (एनएसडीएल) रखेगा। सो खाता भी वहीं खोलना होगा और वह भी परमानेंट रिटायरमेंट अकाउंट नंबर के साथ। वहां अकाउंट खुलवाने के लिए 50 रुपये देने होंगे। जबकि सालाना शुल्क 350 रुपए है। हर ट्रांजेक्शन की फीस 10 रुपये होगी। निवेशकों की आसानी के लिए २२ बैंकों को प्वाइंट ऑफ प्रजेंस (पीओपी) बनाया गया है, जबकि टोटल रेगुलेटर हैं छह। ये पीओपी निवेशक के लिए केवल संपर्क केंद्र का काम करेेंगे और कुछ नहीं। उनकी ब्रांच में जाकर अकाउंट खुलवाया जा सकता है। लेकिन इसका चार्ज 20 रुपए है और ट्रांजेक्शन फीस भी दुगुना है यानी 20 रुपए।बाकी फंड की तुलना में इसकी स्थितिआम जनता के लिए सबसे ज्यादा विश्वसनीय और लाभकारी है म्युचुअल फंड। लेकिन इसमें कुल निवेश का लगभग सवा दो फीसदी एंट्री लोड और डेढ़ फीसदी का मैनेजमेंट चार्ज लगता है। इसके मुकाबले इस नई पेंशन योजना में यह फीस कुल मिलाकर 0.0009 फीसदी के करीब है। हालांकि इसका अकाउंट चार्ज ज्यादा है। लेकिन इसमें अगर ज्यादा पैसे निवेश किए जाएं तो निश्चित रूप से बहुत किफायती होगा।
इसके अलावा इस स्कीम में किसी भी स्टेज पर टैक्स छूट नहीं है। आशा कीजिए कि इस निवेश पर टैक्स छूट हो सरकार की तरफ से, वरना आम निवेशक इससे मुंह मोड़ सकते हैं।

Wednesday, April 29, 2009

जाकी रही भावना जैसी,रूबीना देखिं मूरत तीन्ह तैसी फ्लैश बैक में चलिए। ब्रिटिश टेब्लायड न्यूज ऑफ दि वल्र्ड के स्टिंग ऑपरेशन में दुबई का शेख रूबीना को एडॉप्ट करना चाह रहा है। बदले में रूबीना के पिता को दो लाख पौंड का छेंका (लड़की का बाप जब लड़के को पसंद करता है तो छेंका के रूप में कुछ रकम देकर ही उसे अपनी बेटी के लिए बुक कर लेता है) दे रहा है। फिर रूबीना के मां और सौतेली मां की हाथापाई की तस्वीर मीडिया में आई। उसके रिश्तेदार रूबीना से होनेवाली कमाई में हिस्सा छीनने आए। पुलिस आई। मोहल्ले के कुछ पुरुष रूबीना के पिता के पक्ष में बोले, लेकिन ब्रिटेन में रूबीना के पक्ष में बोलने वाले में अकेले शेखर कपूर थे। अब इस स्टोरी के झोल देखें और मजे करें। पहला झोल:- अखबार ने स्टिंग किया। छापा। कवर पेज पर रफीक कुरैशी (रूबीना के पिता) का चेहरा छुपाने की कोशिश की गई है जबकि उसकी दोनों मांओं को शर्मनाक हालत में लड़ते हुए क्लोजअप शॉट लिया गया है। इस तथाकथित स्टिंग से पहले रफीक को हर कोई जानता था, जबकि उसकी मांओं को कोई नहीं। उस अखबार की विकृत सोच में अंतर को आप खुद पहचानें। आपको लगता है कि अगर रूबीना सही में बिक जाती तो विश्व समुदाय इसे होने देता? नहीं, बच्ची को वापस घर या मिशनरी स्कूल भेजा जाता। दूसरी थियरी यह लग रही है कि रूबीना जवान होकर एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री की हॉट प्रोपर्टी होगी, सो अभी से निवेश करने में कोई बुराई नहीं। इसकी संभावना ज्यादा लग रही है। अगर यह सच है तो सोचें कि एक गरीब बाप के साथ कितनी बड़ी साजिश रची गई कि शेख दुबई का है, बिचौलिया ब्रिटेन का है, कीमत रूपए या दुबई की मुद्रा के बदले पौंड में दी जा रही है। सच, अखबार को बताना चाहिए। दूसरा झोल:- मैडोना इथोपिया आदि जगह जाकर वहां की सरकार से अनुमति लेकर गरीब बच्चे को गोद लेती हैं। लेकिन शेख और अखबार यह सौदा चुपके से कर रहे थे। गोद शब्द पर ध्यान दें। दरअसल गोद और गरीब जुड़वां शब्द हैं। आपने कभी सुना कि किसी अमीर बच्चे को गोद लिया गया? और जब गोद लिया जाता है तो बाजाब्ता कानून की आंखों के सामने, न कि गुपचुप। तीसरा झोल:- मीडिया में रफीक का यह बयान छापा गया कि वह मुंबई से बाहर जाना चाहता है। तो जानकारी के लिए बताऊं कि भारत के बेपढ़े लोग कमाने के लिए जब हवाई जहाज में बैठते हैं तो दुबई जैसे बालू-प्रदेश में जाकर शरण लेते हैं। रफीक इस सच्चाई को पिछले तीस सालों से झेल रहा है, ऐसे में अगर उसके मन में इच्छा है कि वह दुबई जाकर बसे तो क्या हर्ज है? जब शाहरूख कहते हैं कि वे दुबई में एक घर चाहते हैं तब तो मीडिया सवाल नहीं करती? चौथा झोल:-मान लें कि ऑस्कर जीतने पर रूबीना को जितने पैसे मिले, खत्म हो गए। अब सुनें, उसने हाल में शेखर कपूर की एड फिल्म में काम किया है। आगे वह कई हिंदी फिल्मकारों के साथ काम करने वाली है। कहने का आशय यह कि वह अपनी कमाई से परिवार का पेट पाल रही है तो ऐसे में उसे बेचने की जरूरत क्यों पड़ेगी? रफीक स्लम में रहता है, लेकिन है तो मुंबई। रफीक के पड़ोसी भी यही कहते हैं कि सोने के अंडे देनेवाली मुर्गी को कोई जानबूझकर हलाल क्यों करेगा? इस तुलना के लिए माफी, परंतु व्यावसायिक समाज ऐसे उदाहरण तुरंत समझता है। पांचवां झोल:- इस खबर से आहत एनआरआई बिजनेस मैन एआर वानू उवाच, वह अपने एनजीओ के जरिए रूबीना को समुचित शिक्षा-दीक्षा का प्रबंध करेंगे। क्योंकि रूबीना के बेचने की खबर मात्र से उनका दिल द्रवित हो गया। तुलसी ने बहुत पहले कह दिया था, 'संत हृदय नवनीत (मक्खन) समानाÓ। उन्हें शायद लगा होगा कि देश में एक ही रूबीना है। छठा झोल:- आपने रूबीना का सह कलाकार अजहरूद्दीन का स्टिंग सुना? हां, इजरायल के रेस्टोरेंट में, डिनर टेबल पर, देव के कंधे पर फ्रीडा का सिर जरूर देखा। असली बात ये है कि रफीक और उसकी बीवियों में, इन पपाराजियों का अपना चोखा धंधा दिखता है। क्योंकि भारत के गांवों आज भी स्त्रियां, घर के चौके (किचन) की किसी बात पर ऐसे ही लड़ती हैं जैसे रफीक की बीवियों को लड़ते दिखाया गया है। सोचिए, इतना एक्सक्लूसिव और क्लोजअप पिक्चर खींचने के लिए फोटोग्राफर वहां कितने दिनों से बैठे होंगे।
इन दिनों लिखने का मन नहीं करता: राजेंद्र यादव पिछले दिनों हिंदी अकादमी (दिल्ली) के 'इन दिनोंÓ कार्यक्रम में स्त्री और दलित विमर्श के लिए सबके निशाने पर रहे हंस पत्रिका के संपादक राजेंद्र यादव अपने इन दिनों की बात कर रहे थे। साथ में, उनसे इन दिनों की बातचीत करने के लिए अर्चना वर्मा और अजय नावरिया मंच पर मौजूद थे। सब कुछ सांकेतिक और गहरे अर्थ लिये था। स्त्री समाज से डॉ. अर्चना वर्मा थीं तो दलित समाज की नुमाइंदगी जामिया मिल्लिया इस्लामिया के डॉ. अजय नावरिया कर रहे थे। अच्छा, उनके बैठने का स्थान भी शायद सांकेतिक ही था। अर्चना जी इस अस्सी वर्षीय दिग्गज के वाम पक्ष में बैठी थीं तो नावरिया जी दक्षिण पक्ष में विराजमान थे। संयोग ही था कि एक इंच मुस्कान के इस उपन्यासकार के साथ बात करने के लिए नावरिया जी काफी देर से मंच पर आए जबकि अर्चना जी शुरू से उनका साथ निभा रही थीं। ऐसे राजेंद्र यादव जी का संपादक वाला परिचय भी 'इन दिनोंÓ का ही है, वरना हिंदी समाज तो उनका कथाकार, उपन्यासकार, कवि और कुशल अनुवादक का रूप तो पिछले ६० साल से देख रहा है। सबकुछ सांकेतिक इसलिए कि हिंदी अकादमी 'इन दिनोंÓ कार्यक्रम को श्रृंखलाबद्घ करनेवाली है और राजेंद्र जी इस मंच पर आनेवाले पहली साहित्यिक विभूति थे। आजादी के बाद हिंदी समाज को बहुत कुछ देनेवाले इस कथाकार को इन दिनों सब कुछ धुआं-सा लगता है। उनके शब्दों में, 'इतना लिखा, मगर क्या हुआ?Ó ऐसा सच कहने की हिम्मत राजेंद्र जी के ही बूते की बात है, क्योंकि उम्र और कद जितना बड़ा होता है, 'मैं-भावÓ उतना बढ़ता जाता है। लेकिन वह तो अपने कंफेशन में साफ कहते हैं, 'विचारों का अस्तित्व खत्म हो गया है। हम सुंदर भविष्य देना चाहते थे, नहीं दे पाए। यह भविष्यहीनता परेशान करती है, सो अब लिखने का मन नहीं करता।Ó माक्र्सवादी विचारधारा में पले-बढ़े इस कथाकार के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय यह है कि जिस विचारधारा (माक्र्सवादी) को स्थापित करने का प्रयत्न किया, वह अपने मूल स्थान में ही ध्वस्त हो गई और फिर उस विपरीतधर्मी विचारधारा (पूंजीवादी) को अपना लिया गया, जिसका हमेशा से विरोध करते आए थे। इतना कहते-कहते राजेंद्र जी अचानक फ्लैश बैक में जाते हैं और बताते हैं कि आज जो भी ज्ञान है उनके पास उसमें रूसी साहित्य का बड़ा योगदान है। तभी तो चेखव उनके सबसे प्रिय हैं। चेखव को पढऩे के क्रम में ही उन्होंने योग दर्शन और हिंदी कविता पर शोध किया। लेकिन चेखवरागी इस कथाकार की अगली यात्रा सीधे अज्ञेय जी के नदी के द्वीप की होती है, जिसके बाद वे कहते हैं कि व्यक्ति और समाज के बीच अंत:क्रिया होनी चाहिए। असल में यह अस्तित्ववादी दर्शन का समय था। यहां से आगे बढ़ते हुए वे कहते हैं कि ८० प्रतिशत कहानियां स्त्री-पुरुष द्वंद्व पर लिखी गईं। लेकिन दूधनाथ सिंह के आते-आते यह द्वंद्व इतना आगे बढ़ गया कि कहानी बची नहीं, क्योंकि यहां से संबंधों को तोडऩे की कोशिशें की गईं। नतीजा ये रहा कि आत्महत्या या फिर हथियार उठाओ और यही समय नक्सलवाद के सिर उठाने का है। इस कमाल को समझें कि एक कथाकार कैसे अपने समय के समाज, विचारधारा औैर इतिहास-भूगोल सबको अपने में समाहित करता है। इसके बाद १९८६ के आस-पास का समय आता है, जब इस कथाकार ने हंस पत्रिका शुरू की। लेकिन कुछ काल बाद ही (१९९१) उन्हें लगा कि उनके अपने विचार खत्म हो रहे हैं, साथ ही दूसरे विचार भी खत्म हो रहे हैं। हालांकि उनका यह भी मानना है कि विचारधारा से बना समाज (फासिज्म, धर्म, कम्युनिस्ट सभी) क्रूर और निष्ठïुर होगा, क्योंकि तब वे तय विचारों से आगे नहीं सोच सकते। यहां तक उन्होंने अपना कंफेशन किया। इसके बाद बारी थी वार्तालाप की। यहां भी हंस की स्त्री को पहले मौका मिला और अर्चना जी ने पहला गोला दागा कि अगर हथियार व्यर्थ हो रहे हैं तो रास्ता क्या है। जवाब में उन्होंने भीष्म साहनी की कहानी भाग्य रेखा का उल्लेख किया, जिसमें कहानी का नायक सड़क पर ज्योतिषी से अपने हाथ दिखा रहा है, ठीक उसी समय उसके पीछे से अधिकारों की लड़ाई के लिए जुलूस निकल रहा है। उनका इशारा साफ था कि इन दिनों भी रास्ता पीछे से ही निकल रहा है, बस उसे पकडऩे की जरूरत है। हमारे ही बीच राखी सावंत है, हमें इस ओर से आंखें नहीं मूंदना चाहिए। लेकिन राजेंद्र यादव के होने का असली मतलब है स्त्री और दलित। स्त्री ज्यादा। इन दिनों इस चैप्टर पर आते ही उन्होंने कहा कि उन पर विद्वेषपूर्ण आरोप लगाए गए कि उन्हें स्त्री और सेक्स में रुचि है। लेकिन मानसिक रूप से आजाद स्त्री जब शारीरिक रूप से आजाद होना चाहेगी तो क्या आप देह की बात नहीं करेंगे? मन से शरीर को अलग कैसे करेंगे? लेकिन कांवरिया जी के इस आरोप पर कि उनके हंस में दलित, स्त्री के बाद क्यों?, इस पर वे थोड़ा बचते हुए बोले, नहीं असल में स्त्री को लेकर हमले ज्यादा हुए, दलित पर प्राय: मतभेद कम देखे गए। फिर एक कठिन सवाल भी आया कि वे दलित लेखक को कांशेसन किस आधार पर देते हैं? यहां भी उनका सपाट जवाब था, नितांत व्यक्तिगत संस्कार और पसंद। अंत में श्रोता-दीर्घा से एक बाउंसर आया कि हंस को अखबार और साहित्यिक पत्रिका के बीच की खिचड़ी क्यों बना दिया? बिना विचलित हुए उनका जवाब था- साहित्य सूचना है।
मीडिया यहां यूज हो रही है अलग-अलग समय पर इल्जाम लगता था पार्टी वालों पर कि वे अपने लाभ के लिए मीडिया मैनेज करते थे। लगता है दिल्ली की जनता ने इस सच को बहुत अच्छे से समझा है। तभी तो आकृति के निधन के बाद उसके परिवार ने स्कूल प्रशासन से संपर्क करने से पहले मीडिया को फोन किया। गरीब, अमीर, पढ़ा-लिखा और मूर्ख, फॉरवर्ड, बैकवर्ड आदि सभी प्रकार के जाति-बोध खत्म हो जाते हैं, जब 'हंटर चलाने की बारी आती है।Ó बिहार के छोटे शहरों में आज भी मुख्य सड़कों पर गाड़ी की टक्कर से अगर किसी की मौत हो जाती है तो मृतक के परिजन लाश को हॉस्पिटल ले जाने के बजाए सड़क पर लिटाकर तब तक प्रदर्शन करते हैं जब तक कि मुआवजा नहीं मिल जाए। वहां मीडिया नहीं होती सो यह तरीका है। यहां कैमरा है, माइक है, सो तरीका तनिक सोफिस्टिकेटेड है। बचपन में संस्कृत में एक कहानी पढऩी थी-धनमेव बलं लोके। धन के ढेर पर बैठा चूहा दीवार की खूंटी पर टंगी भोज्य सामग्री खा जाता था, यहां भी वही हो रहा है। इस कहानी के सारे एंगल मिलकर खुद मीडिया और विपिन भाटिया (आकृति के पिता) के लिए लाभकारी साबित हो रहे हैं। दिल्ली के वसंत विहार के मॉडल स्कूल में साधारण आदमी अपने बच्चे को पढ़ाने की हिम्मत नहीं कर सकता। और अगर पैसे वाले के बच्चे ऐसे मर जाएं, तो वे अपनी कमियों की ओर देखने के बजाए किसी को बलि का बकरा बनाना चाहते हैं और इसके लिए वे तमाम साधनों का मनचाहा प्रयोग करते हैं। आपने फिल्म देखी होगी मैं ऐसा ही हूं। फिल्म में धनी अनुपम खेर की बेटी ईंशा देओल ड्रग के ओवर डोज से मर जाती है। इसका बदला वे दामाद से लेते हैं। यहां भी पैसे का गुरूर है। मेरी मंशा यहां आकृति के चरित्र पर कीचड़ उछालना नहीं, वरन उसकी मौत पर उसके पिता की राजनीति जाहिर करने की है। कुछ तर्क आपकी नजर है- पहली बात, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कहा गया कि यकीनन नहीं कहा जा सकता कि अस्थमा की वजह से ही मौत हुई। इसलिए विसरा रिपोर्ट के आने का इंतजार किया जा रहा है। लेकिन यह इंतजार विपिन भाटिया जी, या मीडिया से नहीं हो रहा है। दूसरी बात, दिल्ली में ७ मई को वोटिंग है। इस बीच किसी को छींक भी आएगी तो नेताओं की नींद उड़ जाएगी। यहां तो एक मौत हो गई। मौत का गम उचित है लेकिन इसके लिए मीडिया को पुल बनाना कहां तक उचित है। आप खुद सोचें कि सिटी पेज की न्यूज कैसे एकदम से हाइप लेकर फ्रंट पेज न्यूज बन गई है और वह भी तब चुनाव सिर पर है। तीसरी बात कि मीडिया के वे कर्मचारी जिन्हें इस तर्क पर ऐतराज है कि चुनाव मतलब केवल चुनावी रिपोर्टिंग, उन्हें इस सूचना में फुल न्यूजवर्दी दिखेगी। साथ ही जब उन पर पान मसाला गुटका का विज्ञापन छापने से लेकर राखी सावंत की ब्रा दिखाने का आरोप लगेगा तो वे बड़े गर्व के साथ कह सकेंगे कि देखो हमने कितनी बड़ी सोशल भूमिका निभाई है। हमारी कवरेज की वजह से प्रिंसिपल को इस्तीफा देना पड़ा, बाल कल्याण मंत्री को मुआवजे की घोषणा करनी पड़ी, और फिर आप देखें कि प्राइम टाइम में चुनावी खबरों से ज्यादा टीआरपी इस न्यूज को मिली, वगैरह, वगैरह... चौथी बात, आप सोचें कि मीडिया के चौतरफा हमलों के बीच क्यों स्कूल के ही कुछ बच्चों के अभिभावक प्रिंसिपल के साथ हैं। कारण शीशे की तरह साफ है कि अस्थमा के जोर पकडऩे पर रेअर केस में मौत के मामले सामने आए हैं, और, अभी तक इस बात की तरफ किसी का ध्यान नहीं गया है कि जब दमा जोर पर था तो आकृति ने जरूरी इन्हेलर की पफ ली थी या नहीं, अगर नहीं तो यह पूरी तरह से आकृति या उसके अभिभावक की लापरवाही है। अपने आस-पास दमा के पेशेंट को चेक करें, उनकी जेब में रूमाल के साथ इन्हेलर जरूर मिलेगा। और, जो भाटिया आज प्रिंसिपल पर लापरवाही का आरोप लगा रहे हैं, स्कूल द्वारा फोन करने पर जब गाड़ी आकृति को पिक करने आई तो गाड़ी में उसके मम्मी-पापा दोनों में से कोई क्यों नहीं थे। पांचवीं बात, पहले किसी को जीते जी मारने के लिए हस्ताक्षर अभियान चलाए जाते थे। इस केस में फेसबुक पर आलोचना अभियान जोरों पर है कि कैसे यह सब केवल एकमात्र प्रिंसिपल का किया धरा है। यह सही है कि लोकतंत्र में, मीडिया का पड़ोसी (स्थान के हिसाब से) होने के नाते लोगों को अपनी बात मनवाने में ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ती। लेकिन यह मशक्कत थोड़ी कम और धैर्य के साथ हो तो खुद समाज का भला होगा।

Sunday, April 19, 2009

एक आंसू शन्नो के नाम

पाखंडी समाज की सबसे बड़ी खासियत होती है, वहां के बहुत अधिक संख्या में एक साथ कठोर औैर लचीले सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक कानून। बात यहीं नहीं रूकती, इसके बाद अलग-अलग कानूनों का आपस में ऐसा नाभि-नाल संबंध जोड़ा जाता है कि एक को खांसी आए तो बाकी सबको मियादी बुखार हो जाए। मियादी बुखार चूंकि देह तोड़ देता है औैर टूटना कौन चाहता है?, सो अघोषित समझौता हुआ रहता है कि समय करे तो करे, नियमों, कानूनों को कुछ नहीं करने देना है। आप पूछेंगे, इतना लंबा भाषण झाडऩेवाला या तो बेहद पकाऊ इंसान होगा, या फिर बहुत बड़ा जानकार।मैं इन दोनों श्रेणियों से परे, अपनी शन्नो का अभागा बाप हूं, अयूब खान। पत्नी मरतीं, तो 'समाजÓ मुझे विधुर कहता, पता नहीं अब क्या कहेगा। वैसे हमने बस इतना सोचा था कि मदरसे जाने के बजाए हमारी शन्नो एमसीडी स्कूल जाएगी, तो आगे जाकर क्या पता डॉक्टर सॉक्टर बन जाए। यही सोचकर समाज का विरोध सह के भी बच्ची को 'स्कूलÓ भेजा। स्कूल का मतलब आप स्कूल जानेवाले नहीं समझेंगे। मेरा एक दोस्त है बिहारी, कहता है, उसके यहां अंग्रेजी में १० ही हर्फ होते हैं- ए, बी, सी, डी, ई, एफ, जी, एच और 'आईएएसÓ। बस। सो हमने सोचा कि मदरसे के ३६ हर्फ पढऩे के बजाए अगर 'स्कूलÓ के १० लेटर पढ़ेगी, तो क्या पता आईएएस हो जाए, वरना सुना है अब कश्मीर पार से अब लेडीज भी आतंकवादियों की हेड होने लगी है।यही सोचकर हमने बच्चियों को 'स्कूलÓ भेजा था। जब मैं विद्यार्थी था (ऐसे मैं ज्यादा पढ़ा-लिखा हूं नहीं) तो मौलवी कहते थे-'मार-मार कर सिखा देंगे।Ó शन्नो के कोमा में निधन के बावजूद मुझे बस यही याद है कि 'टीचरÓ मार-मार कर सिखा देंगे। मेरी और बेटियां भी उसी 'स्कूलÓ में पढ़ती हैं, क्या पता उन्हीं में से कोई आईएएस हो जाए। इसलिए टीचर के धक्के खाकर मुंह से खून गिराने (टीचर ने सोचा होगा, कितना भी पीटो, खून कैसे गिरेगा, वे तो सोच रही होंगी कि शन्नो ने साजिशन मुंह से खून निकाला होगा) के बाद शन्नो को मैं 'स्कूलÓ से लाने वाला था, तब भी केवल प्रिंसिपल टीचर के कहने पर ही अंतिम ३० मिनट के लिए 'स्कूलÓ में ही छोड़ आया। घर आई, दर्द से कराही, औैर फिर...ऐसे 'स्कूलÓ में मरने के अपने फायदे हैं। मरते ही ५० हजार का चेक आ गया। कुछ दिनों तक काम पर नहीं जाऊंगा तो भी काम चल जाएगा। लेकिन मुख्यमंत्री साहिबा ने टीचर के लिए कहा, ऐसी सजा मिले ताकि आगे के लिए नजीर बन सके..., फालतू का एक और बेरोजगार हो जाएगा। बेचारी टीचर की नौकरी चली जाएगी, अगर कुंवारी होगी तो कौन करेगा शादी? ऐसे भी महिला एवं बाल विकास मंत्री, दिल्ली कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स औैर पता नहीं कौन-कौन सफेदपोश कर्मचारी/संस्थान उस 'स्कूलÓ औैर उसके इस टीचर मंजू के खिलाफ हैं। सुना है शिक्षा को 'सोशल प्रोडक्टÓ बतानेवाले संस्थान (सीबीएसई, ज्ञान आयोग आदि) कह रहे हैं कि बच्चों को शारीरिक औैर मानसिक नुकसान पहुंचाना जुर्म हैं, लेकिन गांव में बिरजू भाई के गणित वाले मास्टर साब आज भी यही कहते हैं-'रेखागणित रेख मन माहीं, बिना मार के आवत नाहीं।Ó और लोगों को शायद ही यकीन हो कि आज के ज्यादातर आईएएस ऑफिसर इसी फलसफे को जीते-बरतते जीवन में इतने सफल हुए हैं।ये मेरी दिली इच्छा है, लेकिन मैंने सुना कि पिछले दिनों ब्रिटेन में एक ऐसा स्कूल खोला गया जिसमें शादीशुदा जोड़े एडमिशन लेंगे, ताकि वे सफल वैवाहिक जीवन के गुर सीख सकें। अगर वहां की सरकार हिंदू धर्मावलंबी होती तो मैं उनसे पूछता कि जब दुनिया में एकमात्र कल्याणकारी देवाधिदेव महादेव अपनी
पहली पत्नी का कल्याण नहीं कर सके, उन्हें आत्महत्या के पाप से नहीं बचा सके, एक पत्नीव्रत मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम अपनी पत्नी को गर्भकाल में तड़ीपाड़ (आज की परिभाषा के अनुसार, क्योंकि तब माता सीता के आचरण से सामाजिक समरसता टूट रही थी) घोषित करते हैं तो फिर उस स्कूल के टीचर (जो खुद महिला सशक्तिकरण से त्रस्त हैं) अपने स्टूडेंट्स की टूटती शादी कैसे बचाएंगे। मैं बच्चों का 'स्कूलÓ नहीं छुड़वाना चाहता, लेकिन यह तो तय हो कि 'स्कूलÓ में 'ब्लैकबोर्डÓ पर 'व्हाइट मार्करÓ चलाने वाला इतना योग्य जरूर हो कि शन्नो कोमा में जाने को विवश नहीं हो, या फिर मदरसे में इतने 'दरवाजे-खिड़कियांÓ खोले जाएं कि कोई शन्नो 'स्कूलÓ आने की हसरत नहीं पाले, तब भी आईएएस हो जाए...

...एक तड़ीपार, एक को पेरोलाभी


वरुण गांधी को पेरोल पर छोड़ा गया। माननीय अदालत ने उन पर लगाए गए एनएसए (राष्टï्रीय सुरक्षा कानून) को भाव नहीं दिया औैर कागज पर शर्तनामा लिखवाकर 'मैदानÓ में खुला छोड़ दिया। कानून के विशेषज्ञ कहते हैं कि उच्च और उच्चतम न्यायालय के पास यह अधिकार है कि ज्यूरी सजा के दायरे में आए या आनेवाले किसी अपराधी या संंदिग्ध के मामले को उसकी 'ग्रेविटीÓ के आधार पर जज करके, विशेष कारणवश कुछ दिनों के लिए जेल से बाहर खुली हवा में सांस लेने की अुनमति दे सकती है। इसी सिलसिले में वरुण गांधी को १४ दिनों के लिए खुली हवा में सांस लेने का मौका दिया गया, ताकि वे संसद पहुंचने की परीक्षा (चुनाव) का फार्म भर सकें। यहां तक मामला बिलकुल परफेक्ट शेप में दिखता है, क्योंकि हमारा कानून कहता है कि दोषी भले छूट जाएं, निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चाहिए और यहां तो वरुण पर एनएसए भी राज्य सरकार ने लगाया है। लेकिन जब उसी न्यायालय की यह बात याद आती है कि न्याय होना नहीं, दिखना भी चाहिए, तो डर लगता है।मेरे डर को जरा आप भी सुनें। प्राकृतिक न्याय का तकाजा है कि जब किसी जानवर से जान-माल का खतरा हो तो उसे मार दिया जाए। ऐसे ही अगर किसी व्यक्ति विशेष से समाज की समरसता मिटने का भय हो, तो पहले कदम के तौर पर ऐसे व्यक्ति को समाज से तड़ीपार किया जाता है, जैसा वेलेंटाइनों की शादी करवाने पर तुले श्रीराम सेना के प्रमोद मुतालिक के साथ किया गया, या फिर जैसा बिग बॉस के घर में साथ रह रहे अपने साथी जुल्फी की बुटीक में बवाल करने के बाद राजा भैया के साथ किया गया। और इससे भी जब बात बनती नहीं दिखती तब या तो इन जैसे समाजभंजकों के लिए जेल की काली कोठरी है या फिर न्यायालय के आदेश पर सीधे स्वर्ग की टिकट। यहां आप मामले पर गौर फरमाएं, प्रमोद मुतालिक के चेलों ने पब से लड़कियों को घसीटकर पीटा था, बदले में तड़ीपार हुआ, लेकिन जब वरुण पीलीभीत में, सामाजिक मंच पर, समाज की मौजूदगी में, समाज में धार्मिक हिंसा फैलाने के लिए 'कच्चा मालÓ (उनके जहर बुझे भाषण) तैयार करते हैं, तो माननीय अदालत उन्हें पेरोल पर बाहर आकर चुनाव लडऩे की अनुमति देती है। मेरा माननीय अदालत की अवमानना का कोई विचार नहीं है लेकिन एक आम नागरिक की तर्ज पर न्यायिक संस्था से यह पूछने का मूल अधिकार तो है ही कि वरुण और संजय दत्त जैसों के लिए जेल के बजाए खुली हवा क्यों? हालांकि माननीय अदालत के उस तर्क से 'कानून पसंद नागरिकोंÓ को रूहआफ्जा वाली दिली ठंडक मिली, जिसमें ये कहा गया कि अदालत कोई गलत नजीर नहीं पेश करना चाहती, आप देखें कि यही संजय चुनावी सभा में एक मुख्यमंत्री को पप्पी और झप्पी देना चाहते हैं। खैर, मैं वापस आता हूं अपने डर पर। कल को अगर मोहम्मद अफजल अदालत से दरख्वास्त करें कि उन्हें मरने से पहले काबा की पवित्र यात्रा करने दिया जाए, तो क्या अदालत सरकारी खर्च पर उन्हें काबा भेजेगी? अभी मोहम्मद अजमल अमीर कसाब ने अदालत में बयान दिया कि उसने जब अपराध किया, तब वह नाबालिग था, सो उसका केस बाल अदालत में चलाया जाए। कानूनी भाषा में अगर कसाब २६/११ को नाबालिग थे, तो उन पर बाल अदालत में ही मुकदमा चलाया जाना चाहिए, लेकिन अदालत ने कसाब की वह मांग खारिज कर दी। अगर न्याय की परिभाषा है कि कटघरे में खड़े व्यक्ति को बचाव का पूरा मौका दिया जाएगा, तब तो कायदे से कसाब की बात की टेस्टिंग कर लेनी चाहिए थी।
भारत क्या, कहीं भी ऐसा नहीं होगा, क्योंकि कसाब जैसों के साथ 'देशÓ नामक भावना जुड़ जाती है। ये तो सबने देखा, महसूस किया कि कसाब और उनके साथियों ने देश की छाती पर कैसा नंगा नाच किया, लेकिन उसी देश ने यह भी देखा, सुना और महसूस किया कि वरुण ने सामाजिक मंच से नंगा नाच किया। फर्क सिर्फ गोली और बोली का है। मान लीजिए कि भारत, अमेरिका हो गया। ऐसे में वह निश्चित रूप से कसाब और उनके आकाओं को कब्र से भी निकालकर फांसी देने की कुव्वत रखता है, लेकिन एक और बार मानिए कि भारत की संसद में भगवान श्रीहरि विष्णु औैर अल्ला दोनों सांसद बनकर आ गए तो दोनों मिलकर भी क्या वरुण की बोली (हालांकि उनकी बोली की फोरेंसिक जांच चल रही है) के मैन और साइड इफैक्ट से देश को बचा पाएंगे? मंडल की टीस आज भी समाज भोग रहा है, बाबरी मस्जिद की 'लाल ईंटेंÓ देश हर पल अपनी छाती पर महसूस करता है। १२० करोड़ की आबादी में, एक मां को छोड़ कोई भी वरुण के सीधे बचाव में नहीं आया, तो फिर पेरोल क्यों? अगर केस कमजोर था और मामला हाई ्रप्रोफाइल था तो रोजाना सुनवाई करवाई जाती (८४ के सिख दंगे वाले केस में किया गया) होती, फैसला होता, निर्दोष होते तो छाती ठोंककर संसद फतह करते।====================================तो बात बन जाएं!क्या चल रहा है, कैसे जीवन का मजा लिया जा रहा है, यह ऐसे सवाल है जो आपको निराश भी कर सकते हैै। भीड़ भरी जिंदगी और भागती लाइफ में यदि कुछ पल का आराम मिल जाये तो यार बात ही बन जाये। लेकिन इन पलों को कहां और कैसे तलाशते है जरा सोचिए, टीवी देखकर, बाहर घूमकर, घर का काम करके आदि। यह लिस्ट काफी लंबी होती है लेकिन आराम और चैन कहां। बोरिंग लाइफ में नया पन लाने के लिये आपको जरूरी है कि आपकी लव लाइफ को मस्ती भरा होना। अब आप सोचेंगे कि यह कैसे। जी हां, यदि आपकी सेक्स या लव लाइफ बिलकुल मस्ती के टै्रक पर है तो सोचिए कि आप स्वस्थ, खुशनुमा इंसान है। क्या आप अपने सेक्स जीवन में निरसता का अनुभव कर रहे हैं? कुछ ऐसे साधारण से उपाय हैं, जो नीरस सेक्स जीवन में नए रंग भर सकते हैं। जिससे जिंदगी में एक नया उत्साह आ जायेगा।आँखों की पट्टी: सिल्क या अन्य किसी कपड़े की छोटी पट्टी बनाइए और अपने साथी की आँखों को ढक दीजिए। इसके बाद उन्हें सोचने दीजिए कि आप क्या करने वाले हैं। नए प्रयोग कीजिए। आँखों पर पट्टी बंधी होने से आपके साथी को भी कुछ अलग सा अहसास होगा। लुकाछिपी का यह खेल काफी मजेदार साबित हो सकता है। आजमा कर देखिए. सुगंधित तेल:अच्छी खुशबू दिलो दिमाग को तरोताज़ा कर देती है। आप अपने शयनकक्ष में कुछ ऐसे सुगंधित तेल रख सकते हैं, जिनका इस्तेमाल मसाज करने मे किया जा सकता हो। यह भी कुछ नया अनुभव देगा। हथकड़ी: सचमुच की ना सही! किसी भी कपड़े का इस्तेमाल आप हथकड़ी बनाने में कर सकते हैं। बस अपने साथी के हाथ कपड़े से बांध दीजिए [ध्यान रखें की उन्हें चोट ना लगे]। इस तरह से कुछ देर के लिए वह आपका गुलाम बन जाएगा (यकीन मानिए इससे उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी)। इसके बाद के क्षण आपके होंगे! बड़ा सा आईना: कभी कभी खुद अपने वे क्षण देखना भी रोमांचकारी हो सकता है। तो क्यों ना आप अपने पलंग के पास किसी बड़े आईने को रख दें। इसके नतीजे रोमांचकारी होंगे। सोफ्टी: रसोईघर में जाएं और फ्रिज में से सोफ्टी, स्ट्राबेरी, क्रीम, जैम अथवा जेली कुछ भी ले निकाल लीजिए। यह सूची कितनी भी लम्बी हो सकती है। अब यह आपके और आपके साथी के ऊपर है कि आप दोनों इनका किस तरह से इस्तेमाल करते हैं। प्रयोग तो अनेकों हैं। कुछ नया सोचिए।
लिपस्टिक: जी हां, लिपस्टिक से एक-दूसरे की बॉडी पर किस करने की प्रतियोगिता आपको एक नया अंदाज भी देगी। ये सभी प्रयोग सेक्स जीवन और अंतरंग क्षणों में नए रंग भर सकते हैं। लेकिन ये पल बेहद निजी होते हैं, इसलिए आप स्वयं ही जान सकते हैं कि आप दोनों कैसे चरम संतुष्टि पा सकते हैं। और जीवन को रंगीन बना सकते है।