Wednesday, April 29, 2009
जाकी रही भावना जैसी,रूबीना देखिं मूरत तीन्ह तैसी फ्लैश बैक में चलिए। ब्रिटिश टेब्लायड न्यूज ऑफ दि वल्र्ड के स्टिंग ऑपरेशन में दुबई का शेख रूबीना को एडॉप्ट करना चाह रहा है। बदले में रूबीना के पिता को दो लाख पौंड का छेंका (लड़की का बाप जब लड़के को पसंद करता है तो छेंका के रूप में कुछ रकम देकर ही उसे अपनी बेटी के लिए बुक कर लेता है) दे रहा है। फिर रूबीना के मां और सौतेली मां की हाथापाई की तस्वीर मीडिया में आई। उसके रिश्तेदार रूबीना से होनेवाली कमाई में हिस्सा छीनने आए। पुलिस आई। मोहल्ले के कुछ पुरुष रूबीना के पिता के पक्ष में बोले, लेकिन ब्रिटेन में रूबीना के पक्ष में बोलने वाले में अकेले शेखर कपूर थे। अब इस स्टोरी के झोल देखें और मजे करें। पहला झोल:- अखबार ने स्टिंग किया। छापा। कवर पेज पर रफीक कुरैशी (रूबीना के पिता) का चेहरा छुपाने की कोशिश की गई है जबकि उसकी दोनों मांओं को शर्मनाक हालत में लड़ते हुए क्लोजअप शॉट लिया गया है। इस तथाकथित स्टिंग से पहले रफीक को हर कोई जानता था, जबकि उसकी मांओं को कोई नहीं। उस अखबार की विकृत सोच में अंतर को आप खुद पहचानें। आपको लगता है कि अगर रूबीना सही में बिक जाती तो विश्व समुदाय इसे होने देता? नहीं, बच्ची को वापस घर या मिशनरी स्कूल भेजा जाता। दूसरी थियरी यह लग रही है कि रूबीना जवान होकर एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री की हॉट प्रोपर्टी होगी, सो अभी से निवेश करने में कोई बुराई नहीं। इसकी संभावना ज्यादा लग रही है। अगर यह सच है तो सोचें कि एक गरीब बाप के साथ कितनी बड़ी साजिश रची गई कि शेख दुबई का है, बिचौलिया ब्रिटेन का है, कीमत रूपए या दुबई की मुद्रा के बदले पौंड में दी जा रही है। सच, अखबार को बताना चाहिए। दूसरा झोल:- मैडोना इथोपिया आदि जगह जाकर वहां की सरकार से अनुमति लेकर गरीब बच्चे को गोद लेती हैं। लेकिन शेख और अखबार यह सौदा चुपके से कर रहे थे। गोद शब्द पर ध्यान दें। दरअसल गोद और गरीब जुड़वां शब्द हैं। आपने कभी सुना कि किसी अमीर बच्चे को गोद लिया गया? और जब गोद लिया जाता है तो बाजाब्ता कानून की आंखों के सामने, न कि गुपचुप। तीसरा झोल:- मीडिया में रफीक का यह बयान छापा गया कि वह मुंबई से बाहर जाना चाहता है। तो जानकारी के लिए बताऊं कि भारत के बेपढ़े लोग कमाने के लिए जब हवाई जहाज में बैठते हैं तो दुबई जैसे बालू-प्रदेश में जाकर शरण लेते हैं। रफीक इस सच्चाई को पिछले तीस सालों से झेल रहा है, ऐसे में अगर उसके मन में इच्छा है कि वह दुबई जाकर बसे तो क्या हर्ज है? जब शाहरूख कहते हैं कि वे दुबई में एक घर चाहते हैं तब तो मीडिया सवाल नहीं करती? चौथा झोल:-मान लें कि ऑस्कर जीतने पर रूबीना को जितने पैसे मिले, खत्म हो गए। अब सुनें, उसने हाल में शेखर कपूर की एड फिल्म में काम किया है। आगे वह कई हिंदी फिल्मकारों के साथ काम करने वाली है। कहने का आशय यह कि वह अपनी कमाई से परिवार का पेट पाल रही है तो ऐसे में उसे बेचने की जरूरत क्यों पड़ेगी? रफीक स्लम में रहता है, लेकिन है तो मुंबई। रफीक के पड़ोसी भी यही कहते हैं कि सोने के अंडे देनेवाली मुर्गी को कोई जानबूझकर हलाल क्यों करेगा? इस तुलना के लिए माफी, परंतु व्यावसायिक समाज ऐसे उदाहरण तुरंत समझता है। पांचवां झोल:- इस खबर से आहत एनआरआई बिजनेस मैन एआर वानू उवाच, वह अपने एनजीओ के जरिए रूबीना को समुचित शिक्षा-दीक्षा का प्रबंध करेंगे। क्योंकि रूबीना के बेचने की खबर मात्र से उनका दिल द्रवित हो गया। तुलसी ने बहुत पहले कह दिया था, 'संत हृदय नवनीत (मक्खन) समानाÓ। उन्हें शायद लगा होगा कि देश में एक ही रूबीना है। छठा झोल:- आपने रूबीना का सह कलाकार अजहरूद्दीन का स्टिंग सुना? हां, इजरायल के रेस्टोरेंट में, डिनर टेबल पर, देव के कंधे पर फ्रीडा का सिर जरूर देखा। असली बात ये है कि रफीक और उसकी बीवियों में, इन पपाराजियों का अपना चोखा धंधा दिखता है। क्योंकि भारत के गांवों आज भी स्त्रियां, घर के चौके (किचन) की किसी बात पर ऐसे ही लड़ती हैं जैसे रफीक की बीवियों को लड़ते दिखाया गया है। सोचिए, इतना एक्सक्लूसिव और क्लोजअप पिक्चर खींचने के लिए फोटोग्राफर वहां कितने दिनों से बैठे होंगे।
इन दिनों लिखने का मन नहीं करता: राजेंद्र यादव पिछले दिनों हिंदी अकादमी (दिल्ली) के 'इन दिनोंÓ कार्यक्रम में स्त्री और दलित विमर्श के लिए सबके निशाने पर रहे हंस पत्रिका के संपादक राजेंद्र यादव अपने इन दिनों की बात कर रहे थे। साथ में, उनसे इन दिनों की बातचीत करने के लिए अर्चना वर्मा और अजय नावरिया मंच पर मौजूद थे। सब कुछ सांकेतिक और गहरे अर्थ लिये था। स्त्री समाज से डॉ. अर्चना वर्मा थीं तो दलित समाज की नुमाइंदगी जामिया मिल्लिया इस्लामिया के डॉ. अजय नावरिया कर रहे थे। अच्छा, उनके बैठने का स्थान भी शायद सांकेतिक ही था। अर्चना जी इस अस्सी वर्षीय दिग्गज के वाम पक्ष में बैठी थीं तो नावरिया जी दक्षिण पक्ष में विराजमान थे। संयोग ही था कि एक इंच मुस्कान के इस उपन्यासकार के साथ बात करने के लिए नावरिया जी काफी देर से मंच पर आए जबकि अर्चना जी शुरू से उनका साथ निभा रही थीं। ऐसे राजेंद्र यादव जी का संपादक वाला परिचय भी 'इन दिनोंÓ का ही है, वरना हिंदी समाज तो उनका कथाकार, उपन्यासकार, कवि और कुशल अनुवादक का रूप तो पिछले ६० साल से देख रहा है। सबकुछ सांकेतिक इसलिए कि हिंदी अकादमी 'इन दिनोंÓ कार्यक्रम को श्रृंखलाबद्घ करनेवाली है और राजेंद्र जी इस मंच पर आनेवाले पहली साहित्यिक विभूति थे। आजादी के बाद हिंदी समाज को बहुत कुछ देनेवाले इस कथाकार को इन दिनों सब कुछ धुआं-सा लगता है। उनके शब्दों में, 'इतना लिखा, मगर क्या हुआ?Ó ऐसा सच कहने की हिम्मत राजेंद्र जी के ही बूते की बात है, क्योंकि उम्र और कद जितना बड़ा होता है, 'मैं-भावÓ उतना बढ़ता जाता है। लेकिन वह तो अपने कंफेशन में साफ कहते हैं, 'विचारों का अस्तित्व खत्म हो गया है। हम सुंदर भविष्य देना चाहते थे, नहीं दे पाए। यह भविष्यहीनता परेशान करती है, सो अब लिखने का मन नहीं करता।Ó माक्र्सवादी विचारधारा में पले-बढ़े इस कथाकार के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय यह है कि जिस विचारधारा (माक्र्सवादी) को स्थापित करने का प्रयत्न किया, वह अपने मूल स्थान में ही ध्वस्त हो गई और फिर उस विपरीतधर्मी विचारधारा (पूंजीवादी) को अपना लिया गया, जिसका हमेशा से विरोध करते आए थे। इतना कहते-कहते राजेंद्र जी अचानक फ्लैश बैक में जाते हैं और बताते हैं कि आज जो भी ज्ञान है उनके पास उसमें रूसी साहित्य का बड़ा योगदान है। तभी तो चेखव उनके सबसे प्रिय हैं। चेखव को पढऩे के क्रम में ही उन्होंने योग दर्शन और हिंदी कविता पर शोध किया। लेकिन चेखवरागी इस कथाकार की अगली यात्रा सीधे अज्ञेय जी के नदी के द्वीप की होती है, जिसके बाद वे कहते हैं कि व्यक्ति और समाज के बीच अंत:क्रिया होनी चाहिए। असल में यह अस्तित्ववादी दर्शन का समय था। यहां से आगे बढ़ते हुए वे कहते हैं कि ८० प्रतिशत कहानियां स्त्री-पुरुष द्वंद्व पर लिखी गईं। लेकिन दूधनाथ सिंह के आते-आते यह द्वंद्व इतना आगे बढ़ गया कि कहानी बची नहीं, क्योंकि यहां से संबंधों को तोडऩे की कोशिशें की गईं। नतीजा ये रहा कि आत्महत्या या फिर हथियार उठाओ और यही समय नक्सलवाद के सिर उठाने का है। इस कमाल को समझें कि एक कथाकार कैसे अपने समय के समाज, विचारधारा औैर इतिहास-भूगोल सबको अपने में समाहित करता है। इसके बाद १९८६ के आस-पास का समय आता है, जब इस कथाकार ने हंस पत्रिका शुरू की। लेकिन कुछ काल बाद ही (१९९१) उन्हें लगा कि उनके अपने विचार खत्म हो रहे हैं, साथ ही दूसरे विचार भी खत्म हो रहे हैं। हालांकि उनका यह भी मानना है कि विचारधारा से बना समाज (फासिज्म, धर्म, कम्युनिस्ट सभी) क्रूर और निष्ठïुर होगा, क्योंकि तब वे तय विचारों से आगे नहीं सोच सकते। यहां तक उन्होंने अपना कंफेशन किया। इसके बाद बारी थी वार्तालाप की। यहां भी हंस की स्त्री को पहले मौका मिला और अर्चना जी ने पहला गोला दागा कि अगर हथियार व्यर्थ हो रहे हैं तो रास्ता क्या है। जवाब में उन्होंने भीष्म साहनी की कहानी भाग्य रेखा का उल्लेख किया, जिसमें कहानी का नायक सड़क पर ज्योतिषी से अपने हाथ दिखा रहा है, ठीक उसी समय उसके पीछे से अधिकारों की लड़ाई के लिए जुलूस निकल रहा है। उनका इशारा साफ था कि इन दिनों भी रास्ता पीछे से ही निकल रहा है, बस उसे पकडऩे की जरूरत है। हमारे ही बीच राखी सावंत है, हमें इस ओर से आंखें नहीं मूंदना चाहिए। लेकिन राजेंद्र यादव के होने का असली मतलब है स्त्री और दलित। स्त्री ज्यादा। इन दिनों इस चैप्टर पर आते ही उन्होंने कहा कि उन पर विद्वेषपूर्ण आरोप लगाए गए कि उन्हें स्त्री और सेक्स में रुचि है। लेकिन मानसिक रूप से आजाद स्त्री जब शारीरिक रूप से आजाद होना चाहेगी तो क्या आप देह की बात नहीं करेंगे? मन से शरीर को अलग कैसे करेंगे? लेकिन कांवरिया जी के इस आरोप पर कि उनके हंस में दलित, स्त्री के बाद क्यों?, इस पर वे थोड़ा बचते हुए बोले, नहीं असल में स्त्री को लेकर हमले ज्यादा हुए, दलित पर प्राय: मतभेद कम देखे गए। फिर एक कठिन सवाल भी आया कि वे दलित लेखक को कांशेसन किस आधार पर देते हैं? यहां भी उनका सपाट जवाब था, नितांत व्यक्तिगत संस्कार और पसंद। अंत में श्रोता-दीर्घा से एक बाउंसर आया कि हंस को अखबार और साहित्यिक पत्रिका के बीच की खिचड़ी क्यों बना दिया? बिना विचलित हुए उनका जवाब था- साहित्य सूचना है।
मीडिया यहां यूज हो रही है अलग-अलग समय पर इल्जाम लगता था पार्टी वालों पर कि वे अपने लाभ के लिए मीडिया मैनेज करते थे। लगता है दिल्ली की जनता ने इस सच को बहुत अच्छे से समझा है। तभी तो आकृति के निधन के बाद उसके परिवार ने स्कूल प्रशासन से संपर्क करने से पहले मीडिया को फोन किया। गरीब, अमीर, पढ़ा-लिखा और मूर्ख, फॉरवर्ड, बैकवर्ड आदि सभी प्रकार के जाति-बोध खत्म हो जाते हैं, जब 'हंटर चलाने की बारी आती है।Ó बिहार के छोटे शहरों में आज भी मुख्य सड़कों पर गाड़ी की टक्कर से अगर किसी की मौत हो जाती है तो मृतक के परिजन लाश को हॉस्पिटल ले जाने के बजाए सड़क पर लिटाकर तब तक प्रदर्शन करते हैं जब तक कि मुआवजा नहीं मिल जाए। वहां मीडिया नहीं होती सो यह तरीका है। यहां कैमरा है, माइक है, सो तरीका तनिक सोफिस्टिकेटेड है। बचपन में संस्कृत में एक कहानी पढऩी थी-धनमेव बलं लोके। धन के ढेर पर बैठा चूहा दीवार की खूंटी पर टंगी भोज्य सामग्री खा जाता था, यहां भी वही हो रहा है। इस कहानी के सारे एंगल मिलकर खुद मीडिया और विपिन भाटिया (आकृति के पिता) के लिए लाभकारी साबित हो रहे हैं। दिल्ली के वसंत विहार के मॉडल स्कूल में साधारण आदमी अपने बच्चे को पढ़ाने की हिम्मत नहीं कर सकता। और अगर पैसे वाले के बच्चे ऐसे मर जाएं, तो वे अपनी कमियों की ओर देखने के बजाए किसी को बलि का बकरा बनाना चाहते हैं और इसके लिए वे तमाम साधनों का मनचाहा प्रयोग करते हैं। आपने फिल्म देखी होगी मैं ऐसा ही हूं। फिल्म में धनी अनुपम खेर की बेटी ईंशा देओल ड्रग के ओवर डोज से मर जाती है। इसका बदला वे दामाद से लेते हैं। यहां भी पैसे का गुरूर है। मेरी मंशा यहां आकृति के चरित्र पर कीचड़ उछालना नहीं, वरन उसकी मौत पर उसके पिता की राजनीति जाहिर करने की है। कुछ तर्क आपकी नजर है- पहली बात, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कहा गया कि यकीनन नहीं कहा जा सकता कि अस्थमा की वजह से ही मौत हुई। इसलिए विसरा रिपोर्ट के आने का इंतजार किया जा रहा है। लेकिन यह इंतजार विपिन भाटिया जी, या मीडिया से नहीं हो रहा है। दूसरी बात, दिल्ली में ७ मई को वोटिंग है। इस बीच किसी को छींक भी आएगी तो नेताओं की नींद उड़ जाएगी। यहां तो एक मौत हो गई। मौत का गम उचित है लेकिन इसके लिए मीडिया को पुल बनाना कहां तक उचित है। आप खुद सोचें कि सिटी पेज की न्यूज कैसे एकदम से हाइप लेकर फ्रंट पेज न्यूज बन गई है और वह भी तब चुनाव सिर पर है। तीसरी बात कि मीडिया के वे कर्मचारी जिन्हें इस तर्क पर ऐतराज है कि चुनाव मतलब केवल चुनावी रिपोर्टिंग, उन्हें इस सूचना में फुल न्यूजवर्दी दिखेगी। साथ ही जब उन पर पान मसाला गुटका का विज्ञापन छापने से लेकर राखी सावंत की ब्रा दिखाने का आरोप लगेगा तो वे बड़े गर्व के साथ कह सकेंगे कि देखो हमने कितनी बड़ी सोशल भूमिका निभाई है। हमारी कवरेज की वजह से प्रिंसिपल को इस्तीफा देना पड़ा, बाल कल्याण मंत्री को मुआवजे की घोषणा करनी पड़ी, और फिर आप देखें कि प्राइम टाइम में चुनावी खबरों से ज्यादा टीआरपी इस न्यूज को मिली, वगैरह, वगैरह... चौथी बात, आप सोचें कि मीडिया के चौतरफा हमलों के बीच क्यों स्कूल के ही कुछ बच्चों के अभिभावक प्रिंसिपल के साथ हैं। कारण शीशे की तरह साफ है कि अस्थमा के जोर पकडऩे पर रेअर केस में मौत के मामले सामने आए हैं, और, अभी तक इस बात की तरफ किसी का ध्यान नहीं गया है कि जब दमा जोर पर था तो आकृति ने जरूरी इन्हेलर की पफ ली थी या नहीं, अगर नहीं तो यह पूरी तरह से आकृति या उसके अभिभावक की लापरवाही है। अपने आस-पास दमा के पेशेंट को चेक करें, उनकी जेब में रूमाल के साथ इन्हेलर जरूर मिलेगा। और, जो भाटिया आज प्रिंसिपल पर लापरवाही का आरोप लगा रहे हैं, स्कूल द्वारा फोन करने पर जब गाड़ी आकृति को पिक करने आई तो गाड़ी में उसके मम्मी-पापा दोनों में से कोई क्यों नहीं थे। पांचवीं बात, पहले किसी को जीते जी मारने के लिए हस्ताक्षर अभियान चलाए जाते थे। इस केस में फेसबुक पर आलोचना अभियान जोरों पर है कि कैसे यह सब केवल एकमात्र प्रिंसिपल का किया धरा है। यह सही है कि लोकतंत्र में, मीडिया का पड़ोसी (स्थान के हिसाब से) होने के नाते लोगों को अपनी बात मनवाने में ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ती। लेकिन यह मशक्कत थोड़ी कम और धैर्य के साथ हो तो खुद समाज का भला होगा।
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