Sunday, May 10, 2009

फिल्मों की भौंडी नकल भर रह गए हैं धारावाहिक

हल्ला किया जा रहा है कि फिल्में पुरुष पर फोकस करती हैं जबकि धारावाहिक महिलाओं पर। यहां मेरी आपत्ति है। तनिक आप भी सुनें। समाज पुरुष प्रधान जरूर है लेकिन जब शो की बात आती है तो पहले महिला को पोर्टेट किया जाता है। शो के दो सबसे सशक्त उप माध्यम हमारे पास हैं-फिल्में और धारावाहिक। वर्तमान दौर में दोनों के मानकों को देखें तो बहुत फासला दिखता है इनके कंटेंट में, इनके दृश्यांकन में, इनकी थ्योरी में। लेकिन अगर दोनों की उम्र को ध्यान में रखकर सोचा जाए तो यह तुलना बेमानी लगती है।१९१२ में देश में पहली बोलती फिल्म बनी आलम आरा। १९८६ में धारावाहिक युग की शुरूआत हुई 'हमलोगÓ से। इस हिसाब से फिल्म सौ साल का होने जा रहा है लेकिन धारावाहिक को महज २१ साल हुए हैं जनमे हुए। इसके साथ एक और बात समझ लें कि अपने देश में टेलीवुड, हमेशा से बॉलीवुड के छाया तले जीने को अभिशप्त रहा है। साफ शब्दों में कहें तो नकल इनका सबसे सशक्त हथियार है। इसलिए जब कोई फिल्म और धारावाहिक में फर्क के पहाड़ खड़े करता है तो तनिक बेचैनी होती है।फिल्म और धारावाहिक के लिए सबसे पहले और सबसे ज्यादा जरूरी चीज है पटकथा। हम देखें कि चंद्रधर शर्मा गुलेरी के 'उसने कहा थाÓ (शायद हिंदी की पहली कहानी) से लेकर ताजा कहानी बालिका वधू तक हर जगह केंद्र में लड़की है। उसने कहा था में लहना सिंह बाजार में नायिका से पूछता है 'तेरी कुड़माई हो गईÓ तो बालिका वधू में दीदीसा वधू को संगीत सिखाने का जतन करती दिखती हैं। देश के एकमात्र वैज्ञानिक फिल्म मिस्टर इंडिया भी तो महिला मोह से नहीं निकल पाई। खैर...प्रेमचंद से लेकर राजेंद्र यादव तक सबकी कहानी के पात्र स्त्री रहे हैं और ज्योंही पुरुष पात्र आता है तो महिला उसकी बैसाखी बनने के लिए तुरंत आ जाती है। तो जब कहानियों का यह हाल हो तो इससे अलग हटकर फिल्मांकन कैसे होगा। हां, मार-धाड़, सेक्स, रोमांस आदि मसाले व्यापकता से हो सकते हैं, लेकिन ेवे भोजन में सब्जी की जगह नहीं ले सकते। आप देखें कि फिल्में जब अपने बाल काल में थीं तो सत्य हरिश्चंद्र (शव्या के बिना कहानी अधूरी है), जय संतोषी मां से लेकर मदर इंडिया तक देव(हरिश्चंद्र), दानव (जय संतोषी मां टाइप फिल्म), साहूकार (मदर इंडिया) से लडऩेवाली स्त्री है। इसके बाद शुरू होता है आस्था, उप्स, चांदनी बार और फैशन का दौर। और हां, इस बीच ललिता पवार के रूप में एवरग्रीन सास का वर्चस्व देखने को मिलता है। इस सास के आगे सारी तुलसी मैया पानी मांगती हैं। और जहां तक जागर्स पार्क और नि:शब्द जैसे फिल्म की बात करें तो उसकी भौंडी नकल में एडल्ट
रोमांस यहां भी है। कभी घर एक सपना सीरियल में तो कभी रियलिटी शो के रूप में। आज की तारीख में फिल्मों में संबंधों को लेकर कुछ प्रयोग हो रहे हैं। तो धारावाहिक भी उस ओर हैं। बंदिनी में अपने से तिगुनी उम्र के दुल्हे से शादी करनेवाली संतू हो या भाग्यविधाता में पकरौवा शादी का फिल्मांकन। नकल बुरी बात नहीं है, लेकिन वह इतनी व्यवस्थित और अनुशासित हो कि कट-पेस्ट नहीं लगे। प्रयोग जारी है...





'महात्माÓ को केवल 'गुरूदेवÓ की जरूरत पड़ती है


पिछली सात मई को कवींद्र रवींद्र नाथ टैगोर की १४९वां जन्म दिन था। साहित्य के क्षेत्र में देश को एममात्र नोबेल पुरस्कार की मुस्कान देनेवाले गुरूदेव की संसद भवन में लगी आदमकद प्रतिमा से यह लगता ही नहीं कि परेशानी ने इन्हें कभी छुआ हो। पुस्तकालय भवन की ओर जानेवाले रास्ते पर गुरूदेव बैठे हैं शायद हमारे पढ़े-अनपढ़ नुमाइंदे को यह बताना चाह रहे हैं कि बिना पढ़े संसद भवन में पैर रखना घोर नैतिक पापा है। गुलाम हिंदुस्तान के अजेय योद्घा महात्मा गांधी से इसी नैतिक मुद्दे पर उनका स्वस्थ अखबारी विमर्श उस गुलामी में भी लोकतंत्र की नई-नई कोंपल फेंकता था। आज के वैयक्तिक अखबारी विमर्श के स्तर को देखकर गुरूदेव याद तो आते हैं।गुरूदेव की महत्ता इस बात में नहीं थी कि वे परम भट्टï विद्वान थे। उनकी महत्ता इस बात में भी नहीं थी कि वे युगद्रष्टा, महान साहित्यकार, दार्शनिक, संगीतज्ञ, चित्रकार, शिक्षाविद्, सामाजिक कार्यकर्ता, राष्ट्रवादी, मानवतावादी आदि विशेषणों की शोभा बढ़ाते थे। बल्कि उनकी महत्ता इसमें थी कि बापू के सहयोग के लिए सीधे साबरमती नहीं जाकर शांति निकेतन में रहकर ऐसी धुनी रमाई कि अपने आप बापू के आजू-बाजू पूरी फौज खड़ी कर हो गई। ठीक वैसे ही जैसे चाणक्य ने चंद्रगुप्त के लिए की थी। आजादी के बाद ऐसी एक ही जुगलबंदी दिखती है इंदिरा गांधी और श्रीकांत वर्मा की। वर्मा जी ने ही इंदिरा जी के लिए गरीबी हटाओ का अभेद्य नारा तैयार किया था। आज की तारीख में गुरूदेव के वंशजों में अमत्र्य सेन और रामचंद्र गुहा जैसों के नाम याद आते हैं जो हमारे सभ्यता-संस्कृति-जीवन-इतिहास की परतें खोलकर शासक के लिए नई दिशा गढ़ रहे हैं।दो शब्द गुरूदेव-महात्माआप शासक की यात्रा तय करके महात्मा हो सकते हैं लेकिन गुरूदेव की जरूरत तब भी पड़ेगी। इसलिए प्लेटो ने दार्शनिक राजा की परिकल्पना की थी। अब दोनों गुण एक व्यक्ति में विरले मिलते हैं सो कसौटी वही रही लेकिन व्यक्ति दो रहे। गुरूदेव की भूमिका कनफ्यूशियस जैसी दिखती है। अपने समय में वे भारत में वही काम कर रहे थे जो लेनिन के देश में लियो टाल्सटाय कर रहे थे। प्रकृति के सान्निध्य से ऊर्जा लेनेवाले गुरूदेव शायद अकेले महापुरुष हैं विश्व इतिहास में जिन्हें एक नहीं दो संप्रभु देशों के लिए राष्टï्रगान लिखा। इन्होंने दो देशों भारत और बांग्लादेश के लिए राष्ट्रीय गान लिखा। बचपन से कुशाग्र बुद्धि के रवींद्रनाथ ने देश और विदेशी साहित्य, दर्शन, संस्कृति आदि को अपने अंदर समाहित कर लिया था और वह मानवता को विशेष महत्व देते थे। इसकी झलक उनकी रचनाओं में भी स्पष्ट रूप से प्रदर्शित होती है। साहित्य के क्षेत्र में उन्होंने अपूर्व योगदान दिया और उनकी रचना गीतांजलि के लिए उन्हें साहित्य के नोबल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था। उन्होंने एक दर्जन से अधिक उपन्यास लिखे। इन रचनाओं में चोखेर बाली, घरे बाइरे, गोरा आदि शामिल हैं। उनके उपन्यासों में मध्यम वर्गीय समाज विशेष रूप से उभर कर सामने आया है। लेकिन गोरा सबसे विशिष्टï है। इस उपन्यास में ब्रिटिश कालीन भारत का जिक्र है। राष्ट्रीयता और मानवता की चर्चा के साथ पारंपरिक हिन्दू समाज और ब्रह्मï समाज पर बहस के साथ विभिन्न प्रचलित समस्याओं पर प्रकाश डाला गया है। इसके साथ ही उसमें स्वतंत्रता संग्राम का भी जिक्र आया है। इतना समय बीत जाने के बाद भी बहुत हद तक उसकी प्रासंगिकता कायम है। इसके अलावा जहां तक उनकी कविता का प्रश्न है तो उनकी कविताओं में अध्यात्मवाद का विशेष जोर रहा है। इसके साथ ही उनकी कविताओं में उपनिषद जैसी भावनाएं महसूस होती हैं। साहित्य की शायद ही कोई शाखा हो जिनमें उनकी रचनाएं नहीं हों। उन्होंने कविता, गीत, कहानी, उपन्यास, नाटक आदि सभी विधाओं में रचनाएं कीं। लेकिन विश्व ने उनको जाना उनकी कृतियों के अंग्रेजी में हुए अनुवाद से। इस अनुवाद का ही कमाल था कि गीतांजलि को साहित्य के नोबेल पुरस्कार के लिए चुना गया। अंग्रे्रजी अनुवाद के बाद पूरा विश्व उनकी प्रतिभा से परिचित हुआ। सात मई 1861 को जोडासांको में पैदा हुए रवींद्रनाथ के नाटक भी अनोखे हैं। हालांकि उन्हें सांकेतिक नाटक ज्यादा लिखे हैं। उनके नाटकों में डाकघर, राजा, विसर्जन आदि शामिल हैं। बचपन से ही रवींद्रनाथ की विलक्षण प्रतिभा का आभास लोगों को होने लगा था। उन्होंने पहली कविता सिर्फ आठ साल में लिखी थी और केवल 16 साल की उम्र में उनकी पहली लघुकथा प्रकाशित हुई थी। रवींद्रनाथ की रचनाओं में मानव और ईश्वर के बीच का स्थाई संपर्क कई रूपों में उभरता है। इसके अलावा उन्हें बचपन से ही प्रकृति का साथ काफी पसंद था। रवींद्रनाथ चाहते थे कि विद्यार्थियों को प्रकृति के सान्निध्य में अध्ययन करना चाहिए। उन्होंने इसी सोच को मूर्त रूप देने के लिए शांति निकेतन की स्थापना की। रवींद्र संगीत बांग्ला संस्कृति का अभिन्न अंग बन गया है। हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत से प्रभावित उनके गीत मानवीय भावनाओं के विभिन्न रंग पेश करते हैं। गुरूदेव बाद के दिनों में चित्र भी बनाने लगे थे। रवींद्रनाथ ने अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, चीन सहित दर्जनों देशों की यात्राएं की थी। सात अगस्त 1941 को देश की यह महान विभूति पंचतत्व में विलीन हो गई। लेकिन शांति निकेतन में फैलाई उनकी ज्योति अभी भी जल रही है।

पप्पू क्यों, बीबी क्यों नहीं

चुनाव आयोग ने बिना शर्त माफी मांगी अपने पप्पू वाले विज्ञापन पर, लेकिन तब तक विज्ञापन अपना काम कर चुका था। हवाएं ऐसे ५२ प्रकार की होती हैं। अभी तक इनका काम था-खुशबू/बदबू घर-घर पहुंचाना, फिर फूल के परागकण को पूरी दुनिया में छींटना जिससे इनकी संतति बढ़ती रहे। इस बार इस पगली, अल्हड़, अलमस्त हवा ने दोनों में से कोई काम नहीं किया। उसने पप्पू को घर-घर पहुंचा दिया। कोई पप्पू १९ साल का था, कोई पप्पू ५० साल का। कोई पप्पू इंंंजीनियर था तो कोई डॉक्टर और कोई डांसर। कोई पप्पू अपनी बीवी का पति था तो कोई अपनी प्यारी पिंकी का पापा। हवा के आवारापन ने इन सबको गैर जिम्मेवार थाली का जिम्मेवार बैंगन बना दिया। आशय यह कि ये जिम्मेवारी से अपनी गैर जिम्मेवारी निभानेवाले कैरेक्टर हैं। सो यह खुशबू तो हर घर जानी थी!मगर पप्पू क्योंकैडबरी एड में पहली बार पप्पू को इंट्रोड्यूस करानेवाले एडमेकर ने कहा कि उन्हें लगा कि पप्पू हमारे बीच का कॉमन नेम है, सो डाल दिया। सोचने की बात है कि ये पप्पू नामक जीव कहां जनमता है। यह महानगरों के एसीनुमा हॉल में अंग्रेजी झाड़ता मिल सकता है, मगर इसका जन्म गांव और कस्बे के सिवा कहीं नहीं हो सकता। महानगर वाले टॉम, डिक, हैरी में यकीन करते हैं। बड़े और छोटे शहर में लोग मेखला और श्रंखला जैसे नाम बना लेते हैं। ऐसे अकेले एडमेकर की क्या बिसात कि पप्पू की यह गत बनाएं, वो तो खुद इन पप्पुओं के बीबी (बिग बी) ने इसे यह कहकर लॉक कर दिया कि पप्पू पास हो गया। मानो यह दुनिया का आठवां अजूबा हो। क्या आपको नहीं लगता कि यह बीबी बिग बी नहीं होकर बिग बेवकूफ था। क्योंकि इस बीबी यानी ब्रांड ब्रेकर को आभास भी नहीं होगा कि वह अपनी इस बनिया हरकत से पप्पू समाज को हिकारत का पात्र बना देगा। आप खुद देखें कि दूसरे बीबी यानी बुरे बदमाश ने एक पैरामीटर सेट कर दिया कि पप्पू कांट डांस साला। उसे लड़की चाहिए तो डांस करना सीखना पड़ेगा। आज आप देखो कि लड़की सिर्फ पैसे मांगती है जो कि उसके पप्पू के पास है! लेकिन हद तो कर दी नए बीबी ने यानी बड़े बदमाशों ने। इस श्रेणी में वे सारे हैं जिनकी रोजी-रोटी-बेटी का जरिया इंग्लिश है। इनका मानना है कि पप्पू गैर जिम्मेवार इंसान है। पप्पू की हालत पर एक शेर याद आता है 'जहां बेदर्द हाकिम हो, वहां फरियाद क्या करना।Ó पप्पू जहां-जहां अपने दर्द की शिकायत कर सकता है, सब जगह बीबी बैठे हैं। चुनाव आयोग से लेकर देश को चलानेवाले हर चौक-चौराहे पर। काम इनके पप्पू से भी बदतर हैं लेकिन ये तो बीबी हैं कोई पप्पू नहीं। बीबी को फर्क नहीं पड़तापप्पू की बीवी को चाहे रात में नींद नहीं आती हो, लेकिन बीबी के बाकी फुल फार्म (बिग बी, ब्रांड ब्रेकर, बुरे बदमाश, बड़े बदमाश आदि) चैन से मुफ्त की कैडबरी खाते हैं और पेप्सी का कुल्ला करते हैं, सफाई के नाम पर जंगल साफकर अपना फार्म हाउस बनवाते हैं, एसी गाड़ी से चलते हैं ताकि सीधा ग्रीन हाउस गैसें छोड़ सकें। क्योंकि ऐसी कोई हवा नहीं जो इस गैस को सीधे किसी बीबी के घर में पहुंचाए। लंका दहन के समय तीन हवाएं (शीतल, मंद, सुगंध) पूरी लंका में नहीं चल रही थीं, लेकिन इस ग्रीन हाउस गैस की आग की लपट में झुलसती दुनिया में ये तीनों हवाएं केवल इन बीबी के घर में बह रही हैं।

ये तो होना था...

गोल्ड स्मिथ से लेकर जब हम अमत्र्य सेन औैर डॉ युनुस खान तक आए तब तक विकास की कई परिभाषाएं जनमकर, पनपकर आपस में ऐसी उलझीं कि हमें विकास के बजाय विकास के न्याय की बात करनी पड़ गई। बचपन में अरावली, शिवालिक, विंध्याचल की पहाडिय़ों के जिक्र बड़े चाव से पढ़ता था और जब टीचर पूरे सुर-ताल में कहते थे-'सतपुड़ा के घने जंगल, नींद में डूबे हुए, ऊंघते-अनमने जंगलÓ तब यह बात समझ से परे थी कि जंगल को नींद कैसे आएगी। आज फरीदाबाद और गुडग़ांव के कई चक्कर लगाने के बाद इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि सतपुड़ा का पता नहीं, मगर दिल्ली की सीमा पर मेवात, गुडग़ांव और फरीदाबाद को पानी देनेवाली अरावली के जंगल तो मर रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार विकास के नाम पर चल रही खुदाई की वजह से इस इलाके का भू जल-स्तर ३०० मीटर नीचे जा चुका है। आप यह न सोचें कि यह मामला सीधे तौर पर आपकी जिंदगी और राजनीति से नहीं जुड़ा है। फरीदाबाद और गुडग़ांव के बीच फंसे दक्षिण दिल्ली के इलाके (बदरपुर से लेकर महरौली तक का १३ किलोमीटर का इलाका १२ महीने सूखा रहता है) में वह दिन दूर नहीं जब पानी को लेकर मर्डर होंगे। वहां के विधायकों और सांसद अभी तक इस समस्या का हल नहीं कर पाई, सरकार भी शायद सोई रही तो अब जाकर न्याय के मंदिर (सुप्रीम कोर्ट) ने अपना घंटा बजाकर चारों ओर मुनादी करवा दी है कि इस इलाके में अब कोई खनन कार्य नहीं होगा।हरियाणा के अरावली हिल्स रेंज में पर्यावरण को गंभीर नुकसान का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि असाधारण हालात में असाधारण उपायों की जरूरत होती है। यह पाबंदी हरियाणा के गुडग़ांव, फरीदाबाद और मेवात जिलों के करीब 448 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में लागू होगी। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय राजधानी की पांच किलोमीटर की परिधि में खनन पर पाबंदी लगाई थी। कोर्ट ने ८ मई के अपने फैसले में कहा कि इलाके में पर्यावरण और खनन से जुड़े कानून के एक भी प्रावधान का पालन नहीं किया गया। सैटलाइट इमेज दिखाते हैं कि बड़े स्तर पर खुदाई के कारण भारी नुकसान हुआ है। इसलिए अब इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती। लेकिन मुद्दा यह नहीं है कि न्याय के मंदिर को अपना 'राजदंडÓ इस्तेमाल करना पड़ा। मुद्दा यह है कि इस मंदिर ने राजदंड उठाने का कारण क्या बताया। कारण यह बताया गया कि 'माइनिंग टिकाऊ विकास के सिद्धांत के तहत है, पर इसे संतुलन के सिद्धांत के तहत भी देखना होगा।Ó माइनिंग टिकाऊ विकास के सिद्धांत से आगे जाकर हो तो यह पाबंदी के सिद्धांत तहत आती है। यह हदों का मामला है। कहने का आशय यह कि टिकाऊ विकास (डवलपमेंट) जरूरी है मगर सततीय विकास (सस्टेनेबल डवलपमेंट) की कीमत पर नहीं। देश भर में ऐसे ही हरित प्रदेश की कमी होती जा रही है। परिणाम भू जल का स्तर नीचे जा रहा है। शहरों में लोगों को पीने का पानी नहीं मिल रहा है। ऐसे भी माइनिंग का पर्यावरण संरक्षण के साथ संतुलन और माइनिंग पर पाबंदी एक ही सिद्धांत के दो पक्ष हैं। बीते सालों में सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण संरक्षण के जरिये माइनिंग को संतुलित करने की कोशिश की है। हालांकि 2004 में ही यह पाया गया था कि नियमों का पालन नहीं हो रहा है, इस कोर्ट ने मौजूदा माइंस के लिए नियमों के पालन पर जोरदार चेतावनी जारी की थी, जिसका मतलब यह नहीं था कि टिकाऊ विकास के सिद्धांतों पर पाबंदी लगा दी गई। हालात सुधरने की जगह बिगड़ गए। कोर्ट को ज्यादा व्यापक नजरिये से देखना पड़ा। कोर्ट ने पहले ही कहा था कि अगर पर्यावरण के नुकसान जारी रहा और उस हालात पर पहुंच जाए जहां से लौटा नहीं जा सकता तो माइनिंग पर पाबंदी के लिए विचार किया जा सकता है। हुआ भी यही। इसी का डर था। इसी की आशा थी। डर उनलोगों के हिस्से का था जिन्हें इस खनन से प्रत्यक्ष फायदा था, आशा उनलोगों को थी, जिन्हें इससे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों फायदे मिलने थे। चाणक्य नीति में एक जगह चर्चा है कि नदी के पानी पर, किनारे रहनेवाले का स्वाभाविक हक है। सो अरावली की पहाडिय़ों की ताजा हवाओं और जल पर फरीदाबाद, मेवात, गुडग़ांव सहित बदरपुर-महरौली की सीधी पट्टïी का प्रथम हक होना चाहिए। हालांकि कोर्ट के डिसीजन में स्थानीयता का जरा भी पुट नहीं दिखता, लेकिन अगर सततीय विकास को लक्ष्य कर किए गए फैसले में स्थानीय जनाकांक्षा शामिल हो तो क्या कहेंगे। यही कि... ये तो होना था।

चाहे जितनी मंदी हो, घर और शराब तो चाहिए...

चीजों को जितनी बार बदलो, वह अपनी पुरानी शक्ल की ओर लौटने लगती है। भौतिक जिंदगी के दो सबसे बड़े सच-घर और शराब (जरूरत और शौक)- के लिए, आदि काल से व्यक्तिजन्य समाज अपने लिए उपलब्ध कराता रहा है। पहले होती थीं हवेलियां। सुनने में अच्छा लग रहा होगा। इसके भीतर का सच ये था कि उस हवेली के सभी बेटों के लिए एक कमरा नहीं होता था। सो जिसकी बीवी मायके रहती थी, उसे बाहर सोना पड़ता था। उसके हिस्से के घर में नया जोड़ा सोता था। सास इस बात का पूरा ख्याल रखती थीं कि हवेली में जितने कमरे उपलब्ध हैं, उतनी बहुएं ही हवेली में रहेंगी, बाकी किसी-न-किसी बहाने मायके भेज दी जाती थीं। यह था तब का फ्लैट मैनेजमेंट। दूसरे, आपने सुना होगा कि प्राचीन काल में यज्ञ में 'सोमÓ का हव्य हर देवता के हिस्से चढ़ाया जाता था। यह सोम और कुछ नहीं बल्कि तब के जमाने की तकनीक के हिसाब से बनी उत्कृष्टï किस्म की शराब थी जिसे इंद्रादि देवता ग्रहण कर जाते थे। इसमें इंद्र चोरी से दूसरे के हिस्से का सोम भी पी जाते थे। इसी से तुलसीदास कहते हैं 'मधवा (इंद्र) महामलिनÓ।उपर्युक्त भूमिका की जरूरत इसलिए पड़ी कि तब से आज तक गंगा में इतना पानी बहा कि वह सूखने को चली। ज्वाइंट फैमिली से न्यूक्लियर फैमिली बन गई। तब की हवेलियों की दीवारें घिसकर पहले घर, फिर फ्लैट और अब नैनो फ्लैट। यानी पहले एकड़ में बनने वाला घर अब ४५ गज के प्लॉट पर बनेगा। १० बाई १० या १० बाई ८ के आकार का यह फ्लैट सिर्फ आपको लेटने और सोने की आजादी देगा। आपका घर आपकी तरह सांस नहीं ले सकेगा। आप खुद सोचें कि इस मंदी की हालत में भी देश को लगभग ढाई करोड़ मकानों की जरूरत है जबकि उधर ब्रांडी, रम, व्हिस्की की बिक्री सालाना करोड़ों पेटियों में हो रही हैं। केवल मैक्डोवेल ब्रांडी की बिक्री पिछले साल ८० लाख पेटी हुई है। एक पेटी में १२ बोतल। या यूं कहें कि ९ लिटर शराब। नैनो फ्लैट जब आएगा जब आएगा तब देखा जाएगा मगर फिलहाल आप यह जानें कि शराब के शाहंशाह विजय माल्या की शराब कंपनी यूएसएल और उसकी सहायक कंपनियों ने मिलकर इस वित्तीय वर्ष में १.५ करोड़ पेटी शराब ज्यादा बेची। यानी लगभग १४ करोड़ लिटर ज्यादा शराब। आनेवाले पांच सालों में १० करोड़ नए वोटर (आप बेरोजगार समझें) होंगे यानी लगभग ५ करोड़ फ्लैट्स (मान लें कि स्त्री-पुरुष अनुपात बराबर है) और कम-से-कम १५ करोड़ लिटर शराब (मानें कि मंदी के असर के बावजूद एक परिवार में हस्बैंड-वाइफ के जन्म-दिन और शादी के दिन एक लिटर शराब की खपत होगी) की डिमांड होगी। इस कमजोर हिसाब-किताब के बावजूद शुरूआती तौर पर इतना तो पता है ही कि घर और शराब, जीवन रक्षक दवा की तरह हैं जिस पर नही चाहते हुए भी आपको खर्च करना पड़ेगा। माना कि आप नहीं पीते लेकिन शादी की सालगिरह पर अपने दोस्त को तो पिलाएंगे न। बात बराबर है!अब आइए देखते हैं कि शराब कंपनियों और घर-कंपनियों की गिद्घ नजर क्या कहती है इस बारे में। रीयल इस्टेट कंपनियां बड़ी तादाद में ऐसे फ्लैट तैयार करने में लगी हैं जो टाटा के नैनो फ्लैट की तर्ज पर कम मार्जिन पर घर बेचेंगी। क्योंकि मार्जिन भले ही कम हो लेकिन फ्लैट की तादाद ज्यादा हो तो मुनाफे पर उतना असर नहीं पड़ेगा। याद रखें 45-45 गज के मकान बनाकर अगर पांच-साढ़े पांच लाख में बेचे जाएं तो कंपनी के मुनाफे पर खास असर नहीं पड़ेगा। हां, 'छिपी बेरोजगारीÓ के शिकार रोजगार प्राप्त लोग इस नए स्लम में जरूर रह सकेंगे। और जहां तक मार्केट के्रडिबिलिटी का सवाल है तो यही एकमात्र फॉम्र्यूला है जिससे बड़े बिल्डरों और रियल्टी कंपनियों पर प्रॉपर्टी बाजार में बुलबुला बनाने का दाग भी मिट सकेगा और पूरे रियल्टी सेक्टर की विश्वसनीयता फिर से बहाल हो सकेगी। भारत में मकानों की मांग और आपूर्ति के बीच जो बड़ी खाई है वह सस्ते फ्लैटों से काफी हद तक भर जाएगी। दूसरी तरफ शराब के बादशाह विजय माल्या के वचन सुनें। वे कहते हैं कि ब्रांडों को नया रूप-रंग देने के लिए कंपनी ने रोमानोव रेड के नए ब्रांड नाम के साथ नया प्रेस्टिज वोदका, व्हाइट एंड मैक्के स्पेशल का रेग्युलर स्कॉच और छोटे पैकों में ब्लैक डॉग को बाजार में उतारा। हमने अपने एंटिक्विटी रेंज, रॉयल चैलेंज, मैकडॉवेल्स नंबर वन और ब्रांडी की पूरी रेंज को भी नया रूप दिया। मूल जोर छोटा पैक, फिक्स प्राइस और ज्यादा मुनाफा पर है। क्योंकि कोई भी मंदी ज्यादा-से-ज्यादा यही कर सकती है कि गाड़ी नहीं खरीदने देगी, लेकिन एक दिन के किराए पर गाड़ी का सुख तो देगी ही। और अगर इससे ईगो हर्ट हो तो नैनो पैक है न!

तुम कौन हो

तुम कौन हो
बीआरटी कॉरिडोर की बस हो या
धौला कुआं ओवरब्रिज पर चलती इनोवा
ट्रांस यमुना की सड़क पर हिचकोले खाती ब्लूलाइन
या रोहिणी की कॉलोनियों में १० रूपए की रिक्शा
तुम कौन हो
किचन की 'प्रगति हो
सास-बहू सीरियल की सास हो
नच ले विद सरोज खान की सरोज हो
कि होंठ रसीले वाली मलाइका अरोड़ा
तुम कौन हो
कल्पना चावला की मां हो
कि उसकी कल्पना से आईपिल्स खाती हो
बोलो, चुप क्यों हो
कहीं ऐसा तो नहीं कि
शंकराचार्य को हराने के बाद तुम चुप हो गईं
कौन हो तुम
एक गोद में लैपटॉप, दूसरे में बेटा
घर लौटो तो बिस्तर पे पति
दिन में काम-पुत्र, रात में काम-पति
तुम कौन हो
जब कपड़े का आविष्कार न हुआ था
पिता के कहने से परशुराम ने काटा था सिर
आज बिना पूछे मारते हैं थप्पड़
कौन हो देवि
सुना है ब्रह्म, विष्णु, महेश को दूध पिलाया तुमने
फिर आज फिगर की फिकर करती हो
तुम कौन हो

Monday, May 4, 2009

लिपस्टिक के साथ वोट क्यों नहीं है फैशन में

महानगरों में बहुत तरह की महिलाएं रहती हैं। मसलन सड़क पर झाड़ू लगाने वाली और घर में बर्तन साफ करने वाली से लेकर पेज थ्री पार्टी में सुर्ख लाल लिपस्टिक और उजले बालों वाली लेडीज तक। अच्छा, यहां की एक और खासियत होती है। पूछो क्या? उपर्युक्त वर्णित महिलाओं और लेडीज के घरों में आय के हिसाब से टीवी है, केबल लाइन भी है। यानी इस बात की पूरी छूट है कि लेडीज गुड टाइम्स पर शिल्पा शेट्टïी को योगा सिखाते देख गुस्से से जलें, फैशन शोज देखकर अपनी बॉडी शेप को आईना में देखें, जूम पर पेज थ्री पार्टी देख अपने किसी को फोन करके पूछें कि उन्हें क्यों नहीं बुलाया..., और झाड़ू लगानेवाली महिलाएं गिलास में चाय पीते हुए 'रसिक बलमाÓ वाला कोई फूहड़ गाना सुनकर स्त्री-आजादी के अलौकिक एहसास से भर जाएं।जिस घर में टीवी घुस गया है, उस घर की यह लाइफ स्टाइल हो गई है। लेकिन तब लाख टके का सवाल है कि टाइट फिटिंग की ड्रेस पर लो कट ब्लाउज (ये महिला-लेडीज दोनों का प्रिय फैशन है, क्योंकि यह उन्हें फ्री होने का एहसास कराती है) का फैशन जीनेवाली महिला/लेडीज के फैशन स्टेटमेंट में अभी तक वोट करना क्यों नहीं आ पाया है?ऐसे ये महिलाएं और लेडीज वोटिंग और सेक्स को लेकर एक राय रखती दिखती हैं। अपने ऑब्जर्वेशन में मैंने देखा है कि गांव से शहर और फिर महानगर तक जब तक ये लड़कियां और गल्र्स होती हैं, वोट और सेक्स को लेकर एक-सा एक्साइटमेंट रखती हैं। मसलन मम्मी/मां किचन में परेशानी का बहाना मार सकती हैं लेकिन ये (लड़कियां/गल्र्स) पापा का हाथ पकड़ वोट की लाइन में कुछ इस एहसास के साथ लगती हैं कि देखो, पुरुषो!, यहां भी मैं तुम्हारे साथ हूं। हालांकि इस बात से बहुतों को आपत्ति हो सकती है, लेकिन सिर्फ उन्हें तीनों जगहों की लड़कियों/महिलाओं या गल्र्स/लेडीज के जीवन को नजदीक से नहीं देखा है। ज्यों ही ये लड़कियां/गल्र्स, महिला/लेडीज में कन्वर्ट होती हैं, उनका इतना एक्सप्लोरेशन या कहें कि एक्सप्लायटेशन हो जाता है कि उनमें एक अजीब किस्म का ' दार्शनिक नकार भावÓ आ जाता है, जैसे दो-तीन बच्चे जनने के बाद या ४०-४५ की उम्र के बाद उनमें सेक्स के प्रति अजीब किस्म का नकार भाव आ जाता है। अब यहां नकार के भी दो अलग-अलग कारण हैं। महिलाएं समझने लग जाती हैं कि बच्चे हो गए सो अब सेक्स की क्या जरूरत?, जबकि कुछ किताबें पढ़ लेने के कारण लेडीज समझने लग जाती हैं कि बेवजह का 'घावÓ क्यों लिया जाए। बल्कि वे तो एक कदम आगे बढ़कर इस मुकाम पर पहुंचने के बाद, लेस्बियन/गेइज्म और एक्सट्रामैरिटल अफेयर्स के अंतहीन प्रवचनों में लीन हो जाती हैं।परिणाम यह कि जैसे सेक्स से विरक्ति, वैसे वोट से। अगर विधानसभा, लोकसभा चुनाव और उपचुनावों को जोड़ दिया जाए तो तकरीबन हर छह महीने में देश में चुनाव होते हैं, लेकिन चैनल, अखबार उसे महिलाओं-लेडीज तक पहुंचा ही देते हैं। यहां मीनोपॉज से ठंडी पड़ी लेडीज देखती है कि उसके ड्राइंग रूम में दो तरह की चर्चा हमेशा होती है- 'सेक्स और चुनावी राजनीतिÓ। सो उन्हें दोनों से खास किस्म की नफरत होने लगती है जो बाद में विरक्ति में बदल जाती है। घाघ राजनेता इस सच को बारीकी से पहचानते हैं इसलिए दिल्ली में जीत की हैट्रिक लगाने वाली महिला मुख्यमंत्री होने के बावजूद यहां इस बार भी महिला मुद्दा नहीं है। तो जब वह केंद्र में ही नहीं है तो वह जोश कहां से लाए, जो २० साल की उम्र में उनमें खुद-ब-खुद आ जाता था। अब तो उसने हर बात पे हारना सीख लिया है। महिला आरक्षण बिल इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। सिर के बाल नहीं नोंचते हुए आप ये समझें कि वोट नहीं करके, कहीं गहरे
इनके चोटिल अहं को मरहम मिलता है। शायद...