Sunday, May 10, 2009
फिल्मों की भौंडी नकल भर रह गए हैं धारावाहिक
रोमांस यहां भी है। कभी घर एक सपना सीरियल में तो कभी रियलिटी शो के रूप में। आज की तारीख में फिल्मों में संबंधों को लेकर कुछ प्रयोग हो रहे हैं। तो धारावाहिक भी उस ओर हैं। बंदिनी में अपने से तिगुनी उम्र के दुल्हे से शादी करनेवाली संतू हो या भाग्यविधाता में पकरौवा शादी का फिल्मांकन। नकल बुरी बात नहीं है, लेकिन वह इतनी व्यवस्थित और अनुशासित हो कि कट-पेस्ट नहीं लगे। प्रयोग जारी है...
'महात्माÓ को केवल 'गुरूदेवÓ की जरूरत पड़ती है
पिछली सात मई को कवींद्र रवींद्र नाथ टैगोर की १४९वां जन्म दिन था। साहित्य के क्षेत्र में देश को एममात्र नोबेल पुरस्कार की मुस्कान देनेवाले गुरूदेव की संसद भवन में लगी आदमकद प्रतिमा से यह लगता ही नहीं कि परेशानी ने इन्हें कभी छुआ हो। पुस्तकालय भवन की ओर जानेवाले रास्ते पर गुरूदेव बैठे हैं शायद हमारे पढ़े-अनपढ़ नुमाइंदे को यह बताना चाह रहे हैं कि बिना पढ़े संसद भवन में पैर रखना घोर नैतिक पापा है। गुलाम हिंदुस्तान के अजेय योद्घा महात्मा गांधी से इसी नैतिक मुद्दे पर उनका स्वस्थ अखबारी विमर्श उस गुलामी में भी लोकतंत्र की नई-नई कोंपल फेंकता था। आज के वैयक्तिक अखबारी विमर्श के स्तर को देखकर गुरूदेव याद तो आते हैं।गुरूदेव की महत्ता इस बात में नहीं थी कि वे परम भट्टï विद्वान थे। उनकी महत्ता इस बात में भी नहीं थी कि वे युगद्रष्टा, महान साहित्यकार, दार्शनिक, संगीतज्ञ, चित्रकार, शिक्षाविद्, सामाजिक कार्यकर्ता, राष्ट्रवादी, मानवतावादी आदि विशेषणों की शोभा बढ़ाते थे। बल्कि उनकी महत्ता इसमें थी कि बापू के सहयोग के लिए सीधे साबरमती नहीं जाकर शांति निकेतन में रहकर ऐसी धुनी रमाई कि अपने आप बापू के आजू-बाजू पूरी फौज खड़ी कर हो गई। ठीक वैसे ही जैसे चाणक्य ने चंद्रगुप्त के लिए की थी। आजादी के बाद ऐसी एक ही जुगलबंदी दिखती है इंदिरा गांधी और श्रीकांत वर्मा की। वर्मा जी ने ही इंदिरा जी के लिए गरीबी हटाओ का अभेद्य नारा तैयार किया था। आज की तारीख में गुरूदेव के वंशजों में अमत्र्य सेन और रामचंद्र गुहा जैसों के नाम याद आते हैं जो हमारे सभ्यता-संस्कृति-जीवन-इतिहास की परतें खोलकर शासक के लिए नई दिशा गढ़ रहे हैं।दो शब्द गुरूदेव-महात्माआप शासक की यात्रा तय करके महात्मा हो सकते हैं लेकिन गुरूदेव की जरूरत तब भी पड़ेगी। इसलिए प्लेटो ने दार्शनिक राजा की परिकल्पना की थी। अब दोनों गुण एक व्यक्ति में विरले मिलते हैं सो कसौटी वही रही लेकिन व्यक्ति दो रहे। गुरूदेव की भूमिका कनफ्यूशियस जैसी दिखती है। अपने समय में वे भारत में वही काम कर रहे थे जो लेनिन के देश में लियो टाल्सटाय कर रहे थे। प्रकृति के सान्निध्य से ऊर्जा लेनेवाले गुरूदेव शायद अकेले महापुरुष हैं विश्व इतिहास में जिन्हें एक नहीं दो संप्रभु देशों के लिए राष्टï्रगान लिखा। इन्होंने दो देशों भारत और बांग्लादेश के लिए राष्ट्रीय गान लिखा। बचपन से कुशाग्र बुद्धि के रवींद्रनाथ ने देश और विदेशी साहित्य, दर्शन, संस्कृति आदि को अपने अंदर समाहित कर लिया था और वह मानवता को विशेष महत्व देते थे। इसकी झलक उनकी रचनाओं में भी स्पष्ट रूप से प्रदर्शित होती है। साहित्य के क्षेत्र में उन्होंने अपूर्व योगदान दिया और उनकी रचना गीतांजलि के लिए उन्हें साहित्य के नोबल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था। उन्होंने एक दर्जन से अधिक उपन्यास लिखे। इन रचनाओं में चोखेर बाली, घरे बाइरे, गोरा आदि शामिल हैं। उनके उपन्यासों में मध्यम वर्गीय समाज विशेष रूप से उभर कर सामने आया है। लेकिन गोरा सबसे विशिष्टï है। इस उपन्यास में ब्रिटिश कालीन भारत का जिक्र है। राष्ट्रीयता और मानवता की चर्चा के साथ पारंपरिक हिन्दू समाज और ब्रह्मï समाज पर बहस के साथ विभिन्न प्रचलित समस्याओं पर प्रकाश डाला गया है। इसके साथ ही उसमें स्वतंत्रता संग्राम का भी जिक्र आया है। इतना समय बीत जाने के बाद भी बहुत हद तक उसकी प्रासंगिकता कायम है। इसके अलावा जहां तक उनकी कविता का प्रश्न है तो उनकी कविताओं में अध्यात्मवाद का विशेष जोर रहा है। इसके साथ ही उनकी कविताओं में उपनिषद जैसी भावनाएं महसूस होती हैं। साहित्य की शायद ही कोई शाखा हो जिनमें उनकी रचनाएं नहीं हों। उन्होंने कविता, गीत, कहानी, उपन्यास, नाटक आदि सभी विधाओं में रचनाएं कीं। लेकिन विश्व ने उनको जाना उनकी कृतियों के अंग्रेजी में हुए अनुवाद से। इस अनुवाद का ही कमाल था कि गीतांजलि को साहित्य के नोबेल पुरस्कार के लिए चुना गया। अंग्रे्रजी अनुवाद के बाद पूरा विश्व उनकी प्रतिभा से परिचित हुआ। सात मई 1861 को जोडासांको में पैदा हुए रवींद्रनाथ के नाटक भी अनोखे हैं। हालांकि उन्हें सांकेतिक नाटक ज्यादा लिखे हैं। उनके नाटकों में डाकघर, राजा, विसर्जन आदि शामिल हैं। बचपन से ही रवींद्रनाथ की विलक्षण प्रतिभा का आभास लोगों को होने लगा था। उन्होंने पहली कविता सिर्फ आठ साल में लिखी थी और केवल 16 साल की उम्र में उनकी पहली लघुकथा प्रकाशित हुई थी। रवींद्रनाथ की रचनाओं में मानव और ईश्वर के बीच का स्थाई संपर्क कई रूपों में उभरता है। इसके अलावा उन्हें बचपन से ही प्रकृति का साथ काफी पसंद था। रवींद्रनाथ चाहते थे कि विद्यार्थियों को प्रकृति के सान्निध्य में अध्ययन करना चाहिए। उन्होंने इसी सोच को मूर्त रूप देने के लिए शांति निकेतन की स्थापना की। रवींद्र संगीत बांग्ला संस्कृति का अभिन्न अंग बन गया है। हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत से प्रभावित उनके गीत मानवीय भावनाओं के विभिन्न रंग पेश करते हैं। गुरूदेव बाद के दिनों में चित्र भी बनाने लगे थे। रवींद्रनाथ ने अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, चीन सहित दर्जनों देशों की यात्राएं की थी। सात अगस्त 1941 को देश की यह महान विभूति पंचतत्व में विलीन हो गई। लेकिन शांति निकेतन में फैलाई उनकी ज्योति अभी भी जल रही है।
पप्पू क्यों, बीबी क्यों नहीं
ये तो होना था...
चाहे जितनी मंदी हो, घर और शराब तो चाहिए...
तुम कौन हो
बीआरटी कॉरिडोर की बस हो या
धौला कुआं ओवरब्रिज पर चलती इनोवा
ट्रांस यमुना की सड़क पर हिचकोले खाती ब्लूलाइन
या रोहिणी की कॉलोनियों में १० रूपए की रिक्शा
तुम कौन हो
किचन की 'प्रगति हो
सास-बहू सीरियल की सास हो
नच ले विद सरोज खान की सरोज हो
कि होंठ रसीले वाली मलाइका अरोड़ा
तुम कौन हो
कल्पना चावला की मां हो
कि उसकी कल्पना से आईपिल्स खाती हो
बोलो, चुप क्यों हो
कहीं ऐसा तो नहीं कि
शंकराचार्य को हराने के बाद तुम चुप हो गईं
कौन हो तुम
एक गोद में लैपटॉप, दूसरे में बेटा
घर लौटो तो बिस्तर पे पति
दिन में काम-पुत्र, रात में काम-पति
तुम कौन हो
जब कपड़े का आविष्कार न हुआ था
पिता के कहने से परशुराम ने काटा था सिर
आज बिना पूछे मारते हैं थप्पड़
कौन हो देवि
सुना है ब्रह्म, विष्णु, महेश को दूध पिलाया तुमने
फिर आज फिगर की फिकर करती हो
तुम कौन हो
Monday, May 4, 2009
लिपस्टिक के साथ वोट क्यों नहीं है फैशन में
इनके चोटिल अहं को मरहम मिलता है। शायद...
