हल्ला किया जा रहा है कि फिल्में पुरुष पर फोकस करती हैं जबकि धारावाहिक महिलाओं पर। यहां मेरी आपत्ति है। तनिक आप भी सुनें। समाज पुरुष प्रधान जरूर है लेकिन जब शो की बात आती है तो पहले महिला को पोर्टेट किया जाता है। शो के दो सबसे सशक्त उप माध्यम हमारे पास हैं-फिल्में और धारावाहिक। वर्तमान दौर में दोनों के मानकों को देखें तो बहुत फासला दिखता है इनके कंटेंट में, इनके दृश्यांकन में, इनकी थ्योरी में। लेकिन अगर दोनों की उम्र को ध्यान में रखकर सोचा जाए तो यह तुलना बेमानी लगती है।१९१२ में देश में पहली बोलती फिल्म बनी आलम आरा। १९८६ में धारावाहिक युग की शुरूआत हुई 'हमलोगÓ से। इस हिसाब से फिल्म सौ साल का होने जा रहा है लेकिन धारावाहिक को महज २१ साल हुए हैं जनमे हुए। इसके साथ एक और बात समझ लें कि अपने देश में टेलीवुड, हमेशा से बॉलीवुड के छाया तले जीने को अभिशप्त रहा है। साफ शब्दों में कहें तो नकल इनका सबसे सशक्त हथियार है। इसलिए जब कोई फिल्म और धारावाहिक में फर्क के पहाड़ खड़े करता है तो तनिक बेचैनी होती है।फिल्म और धारावाहिक के लिए सबसे पहले और सबसे ज्यादा जरूरी चीज है पटकथा। हम देखें कि चंद्रधर शर्मा गुलेरी के 'उसने कहा थाÓ (शायद हिंदी की पहली कहानी) से लेकर ताजा कहानी बालिका वधू तक हर जगह केंद्र में लड़की है। उसने कहा था में लहना सिंह बाजार में नायिका से पूछता है 'तेरी कुड़माई हो गईÓ तो बालिका वधू में दीदीसा वधू को संगीत सिखाने का जतन करती दिखती हैं। देश के एकमात्र वैज्ञानिक फिल्म मिस्टर इंडिया भी तो महिला मोह से नहीं निकल पाई। खैर...प्रेमचंद से लेकर राजेंद्र यादव तक सबकी कहानी के पात्र स्त्री रहे हैं और ज्योंही पुरुष पात्र आता है तो महिला उसकी बैसाखी बनने के लिए तुरंत आ जाती है। तो जब कहानियों का यह हाल हो तो इससे अलग हटकर फिल्मांकन कैसे होगा। हां, मार-धाड़, सेक्स, रोमांस आदि मसाले व्यापकता से हो सकते हैं, लेकिन ेवे भोजन में सब्जी की जगह नहीं ले सकते। आप देखें कि फिल्में जब अपने बाल काल में थीं तो सत्य हरिश्चंद्र (शव्या के बिना कहानी अधूरी है), जय संतोषी मां से लेकर मदर इंडिया तक देव(हरिश्चंद्र), दानव (जय संतोषी मां टाइप फिल्म), साहूकार (मदर इंडिया) से लडऩेवाली स्त्री है। इसके बाद शुरू होता है आस्था, उप्स, चांदनी बार और फैशन का दौर। और हां, इस बीच ललिता पवार के रूप में एवरग्रीन सास का वर्चस्व देखने को मिलता है। इस सास के आगे सारी तुलसी मैया पानी मांगती हैं। और जहां तक जागर्स पार्क और नि:शब्द जैसे फिल्म की बात करें तो उसकी भौंडी नकल में एडल्ट
रोमांस यहां भी है। कभी घर एक सपना सीरियल में तो कभी रियलिटी शो के रूप में। आज की तारीख में फिल्मों में संबंधों को लेकर कुछ प्रयोग हो रहे हैं। तो धारावाहिक भी उस ओर हैं। बंदिनी में अपने से तिगुनी उम्र के दुल्हे से शादी करनेवाली संतू हो या भाग्यविधाता में पकरौवा शादी का फिल्मांकन। नकल बुरी बात नहीं है, लेकिन वह इतनी व्यवस्थित और अनुशासित हो कि कट-पेस्ट नहीं लगे। प्रयोग जारी है...
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