Wednesday, April 29, 2009

जाकी रही भावना जैसी,रूबीना देखिं मूरत तीन्ह तैसी फ्लैश बैक में चलिए। ब्रिटिश टेब्लायड न्यूज ऑफ दि वल्र्ड के स्टिंग ऑपरेशन में दुबई का शेख रूबीना को एडॉप्ट करना चाह रहा है। बदले में रूबीना के पिता को दो लाख पौंड का छेंका (लड़की का बाप जब लड़के को पसंद करता है तो छेंका के रूप में कुछ रकम देकर ही उसे अपनी बेटी के लिए बुक कर लेता है) दे रहा है। फिर रूबीना के मां और सौतेली मां की हाथापाई की तस्वीर मीडिया में आई। उसके रिश्तेदार रूबीना से होनेवाली कमाई में हिस्सा छीनने आए। पुलिस आई। मोहल्ले के कुछ पुरुष रूबीना के पिता के पक्ष में बोले, लेकिन ब्रिटेन में रूबीना के पक्ष में बोलने वाले में अकेले शेखर कपूर थे। अब इस स्टोरी के झोल देखें और मजे करें। पहला झोल:- अखबार ने स्टिंग किया। छापा। कवर पेज पर रफीक कुरैशी (रूबीना के पिता) का चेहरा छुपाने की कोशिश की गई है जबकि उसकी दोनों मांओं को शर्मनाक हालत में लड़ते हुए क्लोजअप शॉट लिया गया है। इस तथाकथित स्टिंग से पहले रफीक को हर कोई जानता था, जबकि उसकी मांओं को कोई नहीं। उस अखबार की विकृत सोच में अंतर को आप खुद पहचानें। आपको लगता है कि अगर रूबीना सही में बिक जाती तो विश्व समुदाय इसे होने देता? नहीं, बच्ची को वापस घर या मिशनरी स्कूल भेजा जाता। दूसरी थियरी यह लग रही है कि रूबीना जवान होकर एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री की हॉट प्रोपर्टी होगी, सो अभी से निवेश करने में कोई बुराई नहीं। इसकी संभावना ज्यादा लग रही है। अगर यह सच है तो सोचें कि एक गरीब बाप के साथ कितनी बड़ी साजिश रची गई कि शेख दुबई का है, बिचौलिया ब्रिटेन का है, कीमत रूपए या दुबई की मुद्रा के बदले पौंड में दी जा रही है। सच, अखबार को बताना चाहिए। दूसरा झोल:- मैडोना इथोपिया आदि जगह जाकर वहां की सरकार से अनुमति लेकर गरीब बच्चे को गोद लेती हैं। लेकिन शेख और अखबार यह सौदा चुपके से कर रहे थे। गोद शब्द पर ध्यान दें। दरअसल गोद और गरीब जुड़वां शब्द हैं। आपने कभी सुना कि किसी अमीर बच्चे को गोद लिया गया? और जब गोद लिया जाता है तो बाजाब्ता कानून की आंखों के सामने, न कि गुपचुप। तीसरा झोल:- मीडिया में रफीक का यह बयान छापा गया कि वह मुंबई से बाहर जाना चाहता है। तो जानकारी के लिए बताऊं कि भारत के बेपढ़े लोग कमाने के लिए जब हवाई जहाज में बैठते हैं तो दुबई जैसे बालू-प्रदेश में जाकर शरण लेते हैं। रफीक इस सच्चाई को पिछले तीस सालों से झेल रहा है, ऐसे में अगर उसके मन में इच्छा है कि वह दुबई जाकर बसे तो क्या हर्ज है? जब शाहरूख कहते हैं कि वे दुबई में एक घर चाहते हैं तब तो मीडिया सवाल नहीं करती? चौथा झोल:-मान लें कि ऑस्कर जीतने पर रूबीना को जितने पैसे मिले, खत्म हो गए। अब सुनें, उसने हाल में शेखर कपूर की एड फिल्म में काम किया है। आगे वह कई हिंदी फिल्मकारों के साथ काम करने वाली है। कहने का आशय यह कि वह अपनी कमाई से परिवार का पेट पाल रही है तो ऐसे में उसे बेचने की जरूरत क्यों पड़ेगी? रफीक स्लम में रहता है, लेकिन है तो मुंबई। रफीक के पड़ोसी भी यही कहते हैं कि सोने के अंडे देनेवाली मुर्गी को कोई जानबूझकर हलाल क्यों करेगा? इस तुलना के लिए माफी, परंतु व्यावसायिक समाज ऐसे उदाहरण तुरंत समझता है। पांचवां झोल:- इस खबर से आहत एनआरआई बिजनेस मैन एआर वानू उवाच, वह अपने एनजीओ के जरिए रूबीना को समुचित शिक्षा-दीक्षा का प्रबंध करेंगे। क्योंकि रूबीना के बेचने की खबर मात्र से उनका दिल द्रवित हो गया। तुलसी ने बहुत पहले कह दिया था, 'संत हृदय नवनीत (मक्खन) समानाÓ। उन्हें शायद लगा होगा कि देश में एक ही रूबीना है। छठा झोल:- आपने रूबीना का सह कलाकार अजहरूद्दीन का स्टिंग सुना? हां, इजरायल के रेस्टोरेंट में, डिनर टेबल पर, देव के कंधे पर फ्रीडा का सिर जरूर देखा। असली बात ये है कि रफीक और उसकी बीवियों में, इन पपाराजियों का अपना चोखा धंधा दिखता है। क्योंकि भारत के गांवों आज भी स्त्रियां, घर के चौके (किचन) की किसी बात पर ऐसे ही लड़ती हैं जैसे रफीक की बीवियों को लड़ते दिखाया गया है। सोचिए, इतना एक्सक्लूसिव और क्लोजअप पिक्चर खींचने के लिए फोटोग्राफर वहां कितने दिनों से बैठे होंगे।
इन दिनों लिखने का मन नहीं करता: राजेंद्र यादव पिछले दिनों हिंदी अकादमी (दिल्ली) के 'इन दिनोंÓ कार्यक्रम में स्त्री और दलित विमर्श के लिए सबके निशाने पर रहे हंस पत्रिका के संपादक राजेंद्र यादव अपने इन दिनों की बात कर रहे थे। साथ में, उनसे इन दिनों की बातचीत करने के लिए अर्चना वर्मा और अजय नावरिया मंच पर मौजूद थे। सब कुछ सांकेतिक और गहरे अर्थ लिये था। स्त्री समाज से डॉ. अर्चना वर्मा थीं तो दलित समाज की नुमाइंदगी जामिया मिल्लिया इस्लामिया के डॉ. अजय नावरिया कर रहे थे। अच्छा, उनके बैठने का स्थान भी शायद सांकेतिक ही था। अर्चना जी इस अस्सी वर्षीय दिग्गज के वाम पक्ष में बैठी थीं तो नावरिया जी दक्षिण पक्ष में विराजमान थे। संयोग ही था कि एक इंच मुस्कान के इस उपन्यासकार के साथ बात करने के लिए नावरिया जी काफी देर से मंच पर आए जबकि अर्चना जी शुरू से उनका साथ निभा रही थीं। ऐसे राजेंद्र यादव जी का संपादक वाला परिचय भी 'इन दिनोंÓ का ही है, वरना हिंदी समाज तो उनका कथाकार, उपन्यासकार, कवि और कुशल अनुवादक का रूप तो पिछले ६० साल से देख रहा है। सबकुछ सांकेतिक इसलिए कि हिंदी अकादमी 'इन दिनोंÓ कार्यक्रम को श्रृंखलाबद्घ करनेवाली है और राजेंद्र जी इस मंच पर आनेवाले पहली साहित्यिक विभूति थे। आजादी के बाद हिंदी समाज को बहुत कुछ देनेवाले इस कथाकार को इन दिनों सब कुछ धुआं-सा लगता है। उनके शब्दों में, 'इतना लिखा, मगर क्या हुआ?Ó ऐसा सच कहने की हिम्मत राजेंद्र जी के ही बूते की बात है, क्योंकि उम्र और कद जितना बड़ा होता है, 'मैं-भावÓ उतना बढ़ता जाता है। लेकिन वह तो अपने कंफेशन में साफ कहते हैं, 'विचारों का अस्तित्व खत्म हो गया है। हम सुंदर भविष्य देना चाहते थे, नहीं दे पाए। यह भविष्यहीनता परेशान करती है, सो अब लिखने का मन नहीं करता।Ó माक्र्सवादी विचारधारा में पले-बढ़े इस कथाकार के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय यह है कि जिस विचारधारा (माक्र्सवादी) को स्थापित करने का प्रयत्न किया, वह अपने मूल स्थान में ही ध्वस्त हो गई और फिर उस विपरीतधर्मी विचारधारा (पूंजीवादी) को अपना लिया गया, जिसका हमेशा से विरोध करते आए थे। इतना कहते-कहते राजेंद्र जी अचानक फ्लैश बैक में जाते हैं और बताते हैं कि आज जो भी ज्ञान है उनके पास उसमें रूसी साहित्य का बड़ा योगदान है। तभी तो चेखव उनके सबसे प्रिय हैं। चेखव को पढऩे के क्रम में ही उन्होंने योग दर्शन और हिंदी कविता पर शोध किया। लेकिन चेखवरागी इस कथाकार की अगली यात्रा सीधे अज्ञेय जी के नदी के द्वीप की होती है, जिसके बाद वे कहते हैं कि व्यक्ति और समाज के बीच अंत:क्रिया होनी चाहिए। असल में यह अस्तित्ववादी दर्शन का समय था। यहां से आगे बढ़ते हुए वे कहते हैं कि ८० प्रतिशत कहानियां स्त्री-पुरुष द्वंद्व पर लिखी गईं। लेकिन दूधनाथ सिंह के आते-आते यह द्वंद्व इतना आगे बढ़ गया कि कहानी बची नहीं, क्योंकि यहां से संबंधों को तोडऩे की कोशिशें की गईं। नतीजा ये रहा कि आत्महत्या या फिर हथियार उठाओ और यही समय नक्सलवाद के सिर उठाने का है। इस कमाल को समझें कि एक कथाकार कैसे अपने समय के समाज, विचारधारा औैर इतिहास-भूगोल सबको अपने में समाहित करता है। इसके बाद १९८६ के आस-पास का समय आता है, जब इस कथाकार ने हंस पत्रिका शुरू की। लेकिन कुछ काल बाद ही (१९९१) उन्हें लगा कि उनके अपने विचार खत्म हो रहे हैं, साथ ही दूसरे विचार भी खत्म हो रहे हैं। हालांकि उनका यह भी मानना है कि विचारधारा से बना समाज (फासिज्म, धर्म, कम्युनिस्ट सभी) क्रूर और निष्ठïुर होगा, क्योंकि तब वे तय विचारों से आगे नहीं सोच सकते। यहां तक उन्होंने अपना कंफेशन किया। इसके बाद बारी थी वार्तालाप की। यहां भी हंस की स्त्री को पहले मौका मिला और अर्चना जी ने पहला गोला दागा कि अगर हथियार व्यर्थ हो रहे हैं तो रास्ता क्या है। जवाब में उन्होंने भीष्म साहनी की कहानी भाग्य रेखा का उल्लेख किया, जिसमें कहानी का नायक सड़क पर ज्योतिषी से अपने हाथ दिखा रहा है, ठीक उसी समय उसके पीछे से अधिकारों की लड़ाई के लिए जुलूस निकल रहा है। उनका इशारा साफ था कि इन दिनों भी रास्ता पीछे से ही निकल रहा है, बस उसे पकडऩे की जरूरत है। हमारे ही बीच राखी सावंत है, हमें इस ओर से आंखें नहीं मूंदना चाहिए। लेकिन राजेंद्र यादव के होने का असली मतलब है स्त्री और दलित। स्त्री ज्यादा। इन दिनों इस चैप्टर पर आते ही उन्होंने कहा कि उन पर विद्वेषपूर्ण आरोप लगाए गए कि उन्हें स्त्री और सेक्स में रुचि है। लेकिन मानसिक रूप से आजाद स्त्री जब शारीरिक रूप से आजाद होना चाहेगी तो क्या आप देह की बात नहीं करेंगे? मन से शरीर को अलग कैसे करेंगे? लेकिन कांवरिया जी के इस आरोप पर कि उनके हंस में दलित, स्त्री के बाद क्यों?, इस पर वे थोड़ा बचते हुए बोले, नहीं असल में स्त्री को लेकर हमले ज्यादा हुए, दलित पर प्राय: मतभेद कम देखे गए। फिर एक कठिन सवाल भी आया कि वे दलित लेखक को कांशेसन किस आधार पर देते हैं? यहां भी उनका सपाट जवाब था, नितांत व्यक्तिगत संस्कार और पसंद। अंत में श्रोता-दीर्घा से एक बाउंसर आया कि हंस को अखबार और साहित्यिक पत्रिका के बीच की खिचड़ी क्यों बना दिया? बिना विचलित हुए उनका जवाब था- साहित्य सूचना है।
मीडिया यहां यूज हो रही है अलग-अलग समय पर इल्जाम लगता था पार्टी वालों पर कि वे अपने लाभ के लिए मीडिया मैनेज करते थे। लगता है दिल्ली की जनता ने इस सच को बहुत अच्छे से समझा है। तभी तो आकृति के निधन के बाद उसके परिवार ने स्कूल प्रशासन से संपर्क करने से पहले मीडिया को फोन किया। गरीब, अमीर, पढ़ा-लिखा और मूर्ख, फॉरवर्ड, बैकवर्ड आदि सभी प्रकार के जाति-बोध खत्म हो जाते हैं, जब 'हंटर चलाने की बारी आती है।Ó बिहार के छोटे शहरों में आज भी मुख्य सड़कों पर गाड़ी की टक्कर से अगर किसी की मौत हो जाती है तो मृतक के परिजन लाश को हॉस्पिटल ले जाने के बजाए सड़क पर लिटाकर तब तक प्रदर्शन करते हैं जब तक कि मुआवजा नहीं मिल जाए। वहां मीडिया नहीं होती सो यह तरीका है। यहां कैमरा है, माइक है, सो तरीका तनिक सोफिस्टिकेटेड है। बचपन में संस्कृत में एक कहानी पढऩी थी-धनमेव बलं लोके। धन के ढेर पर बैठा चूहा दीवार की खूंटी पर टंगी भोज्य सामग्री खा जाता था, यहां भी वही हो रहा है। इस कहानी के सारे एंगल मिलकर खुद मीडिया और विपिन भाटिया (आकृति के पिता) के लिए लाभकारी साबित हो रहे हैं। दिल्ली के वसंत विहार के मॉडल स्कूल में साधारण आदमी अपने बच्चे को पढ़ाने की हिम्मत नहीं कर सकता। और अगर पैसे वाले के बच्चे ऐसे मर जाएं, तो वे अपनी कमियों की ओर देखने के बजाए किसी को बलि का बकरा बनाना चाहते हैं और इसके लिए वे तमाम साधनों का मनचाहा प्रयोग करते हैं। आपने फिल्म देखी होगी मैं ऐसा ही हूं। फिल्म में धनी अनुपम खेर की बेटी ईंशा देओल ड्रग के ओवर डोज से मर जाती है। इसका बदला वे दामाद से लेते हैं। यहां भी पैसे का गुरूर है। मेरी मंशा यहां आकृति के चरित्र पर कीचड़ उछालना नहीं, वरन उसकी मौत पर उसके पिता की राजनीति जाहिर करने की है। कुछ तर्क आपकी नजर है- पहली बात, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कहा गया कि यकीनन नहीं कहा जा सकता कि अस्थमा की वजह से ही मौत हुई। इसलिए विसरा रिपोर्ट के आने का इंतजार किया जा रहा है। लेकिन यह इंतजार विपिन भाटिया जी, या मीडिया से नहीं हो रहा है। दूसरी बात, दिल्ली में ७ मई को वोटिंग है। इस बीच किसी को छींक भी आएगी तो नेताओं की नींद उड़ जाएगी। यहां तो एक मौत हो गई। मौत का गम उचित है लेकिन इसके लिए मीडिया को पुल बनाना कहां तक उचित है। आप खुद सोचें कि सिटी पेज की न्यूज कैसे एकदम से हाइप लेकर फ्रंट पेज न्यूज बन गई है और वह भी तब चुनाव सिर पर है। तीसरी बात कि मीडिया के वे कर्मचारी जिन्हें इस तर्क पर ऐतराज है कि चुनाव मतलब केवल चुनावी रिपोर्टिंग, उन्हें इस सूचना में फुल न्यूजवर्दी दिखेगी। साथ ही जब उन पर पान मसाला गुटका का विज्ञापन छापने से लेकर राखी सावंत की ब्रा दिखाने का आरोप लगेगा तो वे बड़े गर्व के साथ कह सकेंगे कि देखो हमने कितनी बड़ी सोशल भूमिका निभाई है। हमारी कवरेज की वजह से प्रिंसिपल को इस्तीफा देना पड़ा, बाल कल्याण मंत्री को मुआवजे की घोषणा करनी पड़ी, और फिर आप देखें कि प्राइम टाइम में चुनावी खबरों से ज्यादा टीआरपी इस न्यूज को मिली, वगैरह, वगैरह... चौथी बात, आप सोचें कि मीडिया के चौतरफा हमलों के बीच क्यों स्कूल के ही कुछ बच्चों के अभिभावक प्रिंसिपल के साथ हैं। कारण शीशे की तरह साफ है कि अस्थमा के जोर पकडऩे पर रेअर केस में मौत के मामले सामने आए हैं, और, अभी तक इस बात की तरफ किसी का ध्यान नहीं गया है कि जब दमा जोर पर था तो आकृति ने जरूरी इन्हेलर की पफ ली थी या नहीं, अगर नहीं तो यह पूरी तरह से आकृति या उसके अभिभावक की लापरवाही है। अपने आस-पास दमा के पेशेंट को चेक करें, उनकी जेब में रूमाल के साथ इन्हेलर जरूर मिलेगा। और, जो भाटिया आज प्रिंसिपल पर लापरवाही का आरोप लगा रहे हैं, स्कूल द्वारा फोन करने पर जब गाड़ी आकृति को पिक करने आई तो गाड़ी में उसके मम्मी-पापा दोनों में से कोई क्यों नहीं थे। पांचवीं बात, पहले किसी को जीते जी मारने के लिए हस्ताक्षर अभियान चलाए जाते थे। इस केस में फेसबुक पर आलोचना अभियान जोरों पर है कि कैसे यह सब केवल एकमात्र प्रिंसिपल का किया धरा है। यह सही है कि लोकतंत्र में, मीडिया का पड़ोसी (स्थान के हिसाब से) होने के नाते लोगों को अपनी बात मनवाने में ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ती। लेकिन यह मशक्कत थोड़ी कम और धैर्य के साथ हो तो खुद समाज का भला होगा।

Sunday, April 19, 2009

एक आंसू शन्नो के नाम

पाखंडी समाज की सबसे बड़ी खासियत होती है, वहां के बहुत अधिक संख्या में एक साथ कठोर औैर लचीले सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक कानून। बात यहीं नहीं रूकती, इसके बाद अलग-अलग कानूनों का आपस में ऐसा नाभि-नाल संबंध जोड़ा जाता है कि एक को खांसी आए तो बाकी सबको मियादी बुखार हो जाए। मियादी बुखार चूंकि देह तोड़ देता है औैर टूटना कौन चाहता है?, सो अघोषित समझौता हुआ रहता है कि समय करे तो करे, नियमों, कानूनों को कुछ नहीं करने देना है। आप पूछेंगे, इतना लंबा भाषण झाडऩेवाला या तो बेहद पकाऊ इंसान होगा, या फिर बहुत बड़ा जानकार।मैं इन दोनों श्रेणियों से परे, अपनी शन्नो का अभागा बाप हूं, अयूब खान। पत्नी मरतीं, तो 'समाजÓ मुझे विधुर कहता, पता नहीं अब क्या कहेगा। वैसे हमने बस इतना सोचा था कि मदरसे जाने के बजाए हमारी शन्नो एमसीडी स्कूल जाएगी, तो आगे जाकर क्या पता डॉक्टर सॉक्टर बन जाए। यही सोचकर समाज का विरोध सह के भी बच्ची को 'स्कूलÓ भेजा। स्कूल का मतलब आप स्कूल जानेवाले नहीं समझेंगे। मेरा एक दोस्त है बिहारी, कहता है, उसके यहां अंग्रेजी में १० ही हर्फ होते हैं- ए, बी, सी, डी, ई, एफ, जी, एच और 'आईएएसÓ। बस। सो हमने सोचा कि मदरसे के ३६ हर्फ पढऩे के बजाए अगर 'स्कूलÓ के १० लेटर पढ़ेगी, तो क्या पता आईएएस हो जाए, वरना सुना है अब कश्मीर पार से अब लेडीज भी आतंकवादियों की हेड होने लगी है।यही सोचकर हमने बच्चियों को 'स्कूलÓ भेजा था। जब मैं विद्यार्थी था (ऐसे मैं ज्यादा पढ़ा-लिखा हूं नहीं) तो मौलवी कहते थे-'मार-मार कर सिखा देंगे।Ó शन्नो के कोमा में निधन के बावजूद मुझे बस यही याद है कि 'टीचरÓ मार-मार कर सिखा देंगे। मेरी और बेटियां भी उसी 'स्कूलÓ में पढ़ती हैं, क्या पता उन्हीं में से कोई आईएएस हो जाए। इसलिए टीचर के धक्के खाकर मुंह से खून गिराने (टीचर ने सोचा होगा, कितना भी पीटो, खून कैसे गिरेगा, वे तो सोच रही होंगी कि शन्नो ने साजिशन मुंह से खून निकाला होगा) के बाद शन्नो को मैं 'स्कूलÓ से लाने वाला था, तब भी केवल प्रिंसिपल टीचर के कहने पर ही अंतिम ३० मिनट के लिए 'स्कूलÓ में ही छोड़ आया। घर आई, दर्द से कराही, औैर फिर...ऐसे 'स्कूलÓ में मरने के अपने फायदे हैं। मरते ही ५० हजार का चेक आ गया। कुछ दिनों तक काम पर नहीं जाऊंगा तो भी काम चल जाएगा। लेकिन मुख्यमंत्री साहिबा ने टीचर के लिए कहा, ऐसी सजा मिले ताकि आगे के लिए नजीर बन सके..., फालतू का एक और बेरोजगार हो जाएगा। बेचारी टीचर की नौकरी चली जाएगी, अगर कुंवारी होगी तो कौन करेगा शादी? ऐसे भी महिला एवं बाल विकास मंत्री, दिल्ली कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स औैर पता नहीं कौन-कौन सफेदपोश कर्मचारी/संस्थान उस 'स्कूलÓ औैर उसके इस टीचर मंजू के खिलाफ हैं। सुना है शिक्षा को 'सोशल प्रोडक्टÓ बतानेवाले संस्थान (सीबीएसई, ज्ञान आयोग आदि) कह रहे हैं कि बच्चों को शारीरिक औैर मानसिक नुकसान पहुंचाना जुर्म हैं, लेकिन गांव में बिरजू भाई के गणित वाले मास्टर साब आज भी यही कहते हैं-'रेखागणित रेख मन माहीं, बिना मार के आवत नाहीं।Ó और लोगों को शायद ही यकीन हो कि आज के ज्यादातर आईएएस ऑफिसर इसी फलसफे को जीते-बरतते जीवन में इतने सफल हुए हैं।ये मेरी दिली इच्छा है, लेकिन मैंने सुना कि पिछले दिनों ब्रिटेन में एक ऐसा स्कूल खोला गया जिसमें शादीशुदा जोड़े एडमिशन लेंगे, ताकि वे सफल वैवाहिक जीवन के गुर सीख सकें। अगर वहां की सरकार हिंदू धर्मावलंबी होती तो मैं उनसे पूछता कि जब दुनिया में एकमात्र कल्याणकारी देवाधिदेव महादेव अपनी
पहली पत्नी का कल्याण नहीं कर सके, उन्हें आत्महत्या के पाप से नहीं बचा सके, एक पत्नीव्रत मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम अपनी पत्नी को गर्भकाल में तड़ीपाड़ (आज की परिभाषा के अनुसार, क्योंकि तब माता सीता के आचरण से सामाजिक समरसता टूट रही थी) घोषित करते हैं तो फिर उस स्कूल के टीचर (जो खुद महिला सशक्तिकरण से त्रस्त हैं) अपने स्टूडेंट्स की टूटती शादी कैसे बचाएंगे। मैं बच्चों का 'स्कूलÓ नहीं छुड़वाना चाहता, लेकिन यह तो तय हो कि 'स्कूलÓ में 'ब्लैकबोर्डÓ पर 'व्हाइट मार्करÓ चलाने वाला इतना योग्य जरूर हो कि शन्नो कोमा में जाने को विवश नहीं हो, या फिर मदरसे में इतने 'दरवाजे-खिड़कियांÓ खोले जाएं कि कोई शन्नो 'स्कूलÓ आने की हसरत नहीं पाले, तब भी आईएएस हो जाए...

...एक तड़ीपार, एक को पेरोलाभी


वरुण गांधी को पेरोल पर छोड़ा गया। माननीय अदालत ने उन पर लगाए गए एनएसए (राष्टï्रीय सुरक्षा कानून) को भाव नहीं दिया औैर कागज पर शर्तनामा लिखवाकर 'मैदानÓ में खुला छोड़ दिया। कानून के विशेषज्ञ कहते हैं कि उच्च और उच्चतम न्यायालय के पास यह अधिकार है कि ज्यूरी सजा के दायरे में आए या आनेवाले किसी अपराधी या संंदिग्ध के मामले को उसकी 'ग्रेविटीÓ के आधार पर जज करके, विशेष कारणवश कुछ दिनों के लिए जेल से बाहर खुली हवा में सांस लेने की अुनमति दे सकती है। इसी सिलसिले में वरुण गांधी को १४ दिनों के लिए खुली हवा में सांस लेने का मौका दिया गया, ताकि वे संसद पहुंचने की परीक्षा (चुनाव) का फार्म भर सकें। यहां तक मामला बिलकुल परफेक्ट शेप में दिखता है, क्योंकि हमारा कानून कहता है कि दोषी भले छूट जाएं, निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चाहिए और यहां तो वरुण पर एनएसए भी राज्य सरकार ने लगाया है। लेकिन जब उसी न्यायालय की यह बात याद आती है कि न्याय होना नहीं, दिखना भी चाहिए, तो डर लगता है।मेरे डर को जरा आप भी सुनें। प्राकृतिक न्याय का तकाजा है कि जब किसी जानवर से जान-माल का खतरा हो तो उसे मार दिया जाए। ऐसे ही अगर किसी व्यक्ति विशेष से समाज की समरसता मिटने का भय हो, तो पहले कदम के तौर पर ऐसे व्यक्ति को समाज से तड़ीपार किया जाता है, जैसा वेलेंटाइनों की शादी करवाने पर तुले श्रीराम सेना के प्रमोद मुतालिक के साथ किया गया, या फिर जैसा बिग बॉस के घर में साथ रह रहे अपने साथी जुल्फी की बुटीक में बवाल करने के बाद राजा भैया के साथ किया गया। और इससे भी जब बात बनती नहीं दिखती तब या तो इन जैसे समाजभंजकों के लिए जेल की काली कोठरी है या फिर न्यायालय के आदेश पर सीधे स्वर्ग की टिकट। यहां आप मामले पर गौर फरमाएं, प्रमोद मुतालिक के चेलों ने पब से लड़कियों को घसीटकर पीटा था, बदले में तड़ीपार हुआ, लेकिन जब वरुण पीलीभीत में, सामाजिक मंच पर, समाज की मौजूदगी में, समाज में धार्मिक हिंसा फैलाने के लिए 'कच्चा मालÓ (उनके जहर बुझे भाषण) तैयार करते हैं, तो माननीय अदालत उन्हें पेरोल पर बाहर आकर चुनाव लडऩे की अनुमति देती है। मेरा माननीय अदालत की अवमानना का कोई विचार नहीं है लेकिन एक आम नागरिक की तर्ज पर न्यायिक संस्था से यह पूछने का मूल अधिकार तो है ही कि वरुण और संजय दत्त जैसों के लिए जेल के बजाए खुली हवा क्यों? हालांकि माननीय अदालत के उस तर्क से 'कानून पसंद नागरिकोंÓ को रूहआफ्जा वाली दिली ठंडक मिली, जिसमें ये कहा गया कि अदालत कोई गलत नजीर नहीं पेश करना चाहती, आप देखें कि यही संजय चुनावी सभा में एक मुख्यमंत्री को पप्पी और झप्पी देना चाहते हैं। खैर, मैं वापस आता हूं अपने डर पर। कल को अगर मोहम्मद अफजल अदालत से दरख्वास्त करें कि उन्हें मरने से पहले काबा की पवित्र यात्रा करने दिया जाए, तो क्या अदालत सरकारी खर्च पर उन्हें काबा भेजेगी? अभी मोहम्मद अजमल अमीर कसाब ने अदालत में बयान दिया कि उसने जब अपराध किया, तब वह नाबालिग था, सो उसका केस बाल अदालत में चलाया जाए। कानूनी भाषा में अगर कसाब २६/११ को नाबालिग थे, तो उन पर बाल अदालत में ही मुकदमा चलाया जाना चाहिए, लेकिन अदालत ने कसाब की वह मांग खारिज कर दी। अगर न्याय की परिभाषा है कि कटघरे में खड़े व्यक्ति को बचाव का पूरा मौका दिया जाएगा, तब तो कायदे से कसाब की बात की टेस्टिंग कर लेनी चाहिए थी।
भारत क्या, कहीं भी ऐसा नहीं होगा, क्योंकि कसाब जैसों के साथ 'देशÓ नामक भावना जुड़ जाती है। ये तो सबने देखा, महसूस किया कि कसाब और उनके साथियों ने देश की छाती पर कैसा नंगा नाच किया, लेकिन उसी देश ने यह भी देखा, सुना और महसूस किया कि वरुण ने सामाजिक मंच से नंगा नाच किया। फर्क सिर्फ गोली और बोली का है। मान लीजिए कि भारत, अमेरिका हो गया। ऐसे में वह निश्चित रूप से कसाब और उनके आकाओं को कब्र से भी निकालकर फांसी देने की कुव्वत रखता है, लेकिन एक और बार मानिए कि भारत की संसद में भगवान श्रीहरि विष्णु औैर अल्ला दोनों सांसद बनकर आ गए तो दोनों मिलकर भी क्या वरुण की बोली (हालांकि उनकी बोली की फोरेंसिक जांच चल रही है) के मैन और साइड इफैक्ट से देश को बचा पाएंगे? मंडल की टीस आज भी समाज भोग रहा है, बाबरी मस्जिद की 'लाल ईंटेंÓ देश हर पल अपनी छाती पर महसूस करता है। १२० करोड़ की आबादी में, एक मां को छोड़ कोई भी वरुण के सीधे बचाव में नहीं आया, तो फिर पेरोल क्यों? अगर केस कमजोर था और मामला हाई ्रप्रोफाइल था तो रोजाना सुनवाई करवाई जाती (८४ के सिख दंगे वाले केस में किया गया) होती, फैसला होता, निर्दोष होते तो छाती ठोंककर संसद फतह करते।====================================तो बात बन जाएं!क्या चल रहा है, कैसे जीवन का मजा लिया जा रहा है, यह ऐसे सवाल है जो आपको निराश भी कर सकते हैै। भीड़ भरी जिंदगी और भागती लाइफ में यदि कुछ पल का आराम मिल जाये तो यार बात ही बन जाये। लेकिन इन पलों को कहां और कैसे तलाशते है जरा सोचिए, टीवी देखकर, बाहर घूमकर, घर का काम करके आदि। यह लिस्ट काफी लंबी होती है लेकिन आराम और चैन कहां। बोरिंग लाइफ में नया पन लाने के लिये आपको जरूरी है कि आपकी लव लाइफ को मस्ती भरा होना। अब आप सोचेंगे कि यह कैसे। जी हां, यदि आपकी सेक्स या लव लाइफ बिलकुल मस्ती के टै्रक पर है तो सोचिए कि आप स्वस्थ, खुशनुमा इंसान है। क्या आप अपने सेक्स जीवन में निरसता का अनुभव कर रहे हैं? कुछ ऐसे साधारण से उपाय हैं, जो नीरस सेक्स जीवन में नए रंग भर सकते हैं। जिससे जिंदगी में एक नया उत्साह आ जायेगा।आँखों की पट्टी: सिल्क या अन्य किसी कपड़े की छोटी पट्टी बनाइए और अपने साथी की आँखों को ढक दीजिए। इसके बाद उन्हें सोचने दीजिए कि आप क्या करने वाले हैं। नए प्रयोग कीजिए। आँखों पर पट्टी बंधी होने से आपके साथी को भी कुछ अलग सा अहसास होगा। लुकाछिपी का यह खेल काफी मजेदार साबित हो सकता है। आजमा कर देखिए. सुगंधित तेल:अच्छी खुशबू दिलो दिमाग को तरोताज़ा कर देती है। आप अपने शयनकक्ष में कुछ ऐसे सुगंधित तेल रख सकते हैं, जिनका इस्तेमाल मसाज करने मे किया जा सकता हो। यह भी कुछ नया अनुभव देगा। हथकड़ी: सचमुच की ना सही! किसी भी कपड़े का इस्तेमाल आप हथकड़ी बनाने में कर सकते हैं। बस अपने साथी के हाथ कपड़े से बांध दीजिए [ध्यान रखें की उन्हें चोट ना लगे]। इस तरह से कुछ देर के लिए वह आपका गुलाम बन जाएगा (यकीन मानिए इससे उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी)। इसके बाद के क्षण आपके होंगे! बड़ा सा आईना: कभी कभी खुद अपने वे क्षण देखना भी रोमांचकारी हो सकता है। तो क्यों ना आप अपने पलंग के पास किसी बड़े आईने को रख दें। इसके नतीजे रोमांचकारी होंगे। सोफ्टी: रसोईघर में जाएं और फ्रिज में से सोफ्टी, स्ट्राबेरी, क्रीम, जैम अथवा जेली कुछ भी ले निकाल लीजिए। यह सूची कितनी भी लम्बी हो सकती है। अब यह आपके और आपके साथी के ऊपर है कि आप दोनों इनका किस तरह से इस्तेमाल करते हैं। प्रयोग तो अनेकों हैं। कुछ नया सोचिए।
लिपस्टिक: जी हां, लिपस्टिक से एक-दूसरे की बॉडी पर किस करने की प्रतियोगिता आपको एक नया अंदाज भी देगी। ये सभी प्रयोग सेक्स जीवन और अंतरंग क्षणों में नए रंग भर सकते हैं। लेकिन ये पल बेहद निजी होते हैं, इसलिए आप स्वयं ही जान सकते हैं कि आप दोनों कैसे चरम संतुष्टि पा सकते हैं। और जीवन को रंगीन बना सकते है।