पाखंडी समाज की सबसे बड़ी खासियत होती है, वहां के बहुत अधिक संख्या में एक साथ कठोर औैर लचीले सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक कानून। बात यहीं नहीं रूकती, इसके बाद अलग-अलग कानूनों का आपस में ऐसा नाभि-नाल संबंध जोड़ा जाता है कि एक को खांसी आए तो बाकी सबको मियादी बुखार हो जाए। मियादी बुखार चूंकि देह तोड़ देता है औैर टूटना कौन चाहता है?, सो अघोषित समझौता हुआ रहता है कि समय करे तो करे, नियमों, कानूनों को कुछ नहीं करने देना है। आप पूछेंगे, इतना लंबा भाषण झाडऩेवाला या तो बेहद पकाऊ इंसान होगा, या फिर बहुत बड़ा जानकार।मैं इन दोनों श्रेणियों से परे, अपनी शन्नो का अभागा बाप हूं, अयूब खान। पत्नी मरतीं, तो 'समाजÓ मुझे विधुर कहता, पता नहीं अब क्या कहेगा। वैसे हमने बस इतना सोचा था कि मदरसे जाने के बजाए हमारी शन्नो एमसीडी स्कूल जाएगी, तो आगे जाकर क्या पता डॉक्टर सॉक्टर बन जाए। यही सोचकर समाज का विरोध सह के भी बच्ची को 'स्कूलÓ भेजा। स्कूल का मतलब आप स्कूल जानेवाले नहीं समझेंगे। मेरा एक दोस्त है बिहारी, कहता है, उसके यहां अंग्रेजी में १० ही हर्फ होते हैं- ए, बी, सी, डी, ई, एफ, जी, एच और 'आईएएसÓ। बस। सो हमने सोचा कि मदरसे के ३६ हर्फ पढऩे के बजाए अगर 'स्कूलÓ के १० लेटर पढ़ेगी, तो क्या पता आईएएस हो जाए, वरना सुना है अब कश्मीर पार से अब लेडीज भी आतंकवादियों की हेड होने लगी है।यही सोचकर हमने बच्चियों को 'स्कूलÓ भेजा था। जब मैं विद्यार्थी था (ऐसे मैं ज्यादा पढ़ा-लिखा हूं नहीं) तो मौलवी कहते थे-'मार-मार कर सिखा देंगे।Ó शन्नो के कोमा में निधन के बावजूद मुझे बस यही याद है कि 'टीचरÓ मार-मार कर सिखा देंगे। मेरी और बेटियां भी उसी 'स्कूलÓ में पढ़ती हैं, क्या पता उन्हीं में से कोई आईएएस हो जाए। इसलिए टीचर के धक्के खाकर मुंह से खून गिराने (टीचर ने सोचा होगा, कितना भी पीटो, खून कैसे गिरेगा, वे तो सोच रही होंगी कि शन्नो ने साजिशन मुंह से खून निकाला होगा) के बाद शन्नो को मैं 'स्कूलÓ से लाने वाला था, तब भी केवल प्रिंसिपल टीचर के कहने पर ही अंतिम ३० मिनट के लिए 'स्कूलÓ में ही छोड़ आया। घर आई, दर्द से कराही, औैर फिर...ऐसे 'स्कूलÓ में मरने के अपने फायदे हैं। मरते ही ५० हजार का चेक आ गया। कुछ दिनों तक काम पर नहीं जाऊंगा तो भी काम चल जाएगा। लेकिन मुख्यमंत्री साहिबा ने टीचर के लिए कहा, ऐसी सजा मिले ताकि आगे के लिए नजीर बन सके..., फालतू का एक और बेरोजगार हो जाएगा। बेचारी टीचर की नौकरी चली जाएगी, अगर कुंवारी होगी तो कौन करेगा शादी? ऐसे भी महिला एवं बाल विकास मंत्री, दिल्ली कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स औैर पता नहीं कौन-कौन सफेदपोश कर्मचारी/संस्थान उस 'स्कूलÓ औैर उसके इस टीचर मंजू के खिलाफ हैं। सुना है शिक्षा को 'सोशल प्रोडक्टÓ बतानेवाले संस्थान (सीबीएसई, ज्ञान आयोग आदि) कह रहे हैं कि बच्चों को शारीरिक औैर मानसिक नुकसान पहुंचाना जुर्म हैं, लेकिन गांव में बिरजू भाई के गणित वाले मास्टर साब आज भी यही कहते हैं-'रेखागणित रेख मन माहीं, बिना मार के आवत नाहीं।Ó और लोगों को शायद ही यकीन हो कि आज के ज्यादातर आईएएस ऑफिसर इसी फलसफे को जीते-बरतते जीवन में इतने सफल हुए हैं।ये मेरी दिली इच्छा है, लेकिन मैंने सुना कि पिछले दिनों ब्रिटेन में एक ऐसा स्कूल खोला गया जिसमें शादीशुदा जोड़े एडमिशन लेंगे, ताकि वे सफल वैवाहिक जीवन के गुर सीख सकें। अगर वहां की सरकार हिंदू धर्मावलंबी होती तो मैं उनसे पूछता कि जब दुनिया में एकमात्र कल्याणकारी देवाधिदेव महादेव अपनी
पहली पत्नी का कल्याण नहीं कर सके, उन्हें आत्महत्या के पाप से नहीं बचा सके, एक पत्नीव्रत मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम अपनी पत्नी को गर्भकाल में तड़ीपाड़ (आज की परिभाषा के अनुसार, क्योंकि तब माता सीता के आचरण से सामाजिक समरसता टूट रही थी) घोषित करते हैं तो फिर उस स्कूल के टीचर (जो खुद महिला सशक्तिकरण से त्रस्त हैं) अपने स्टूडेंट्स की टूटती शादी कैसे बचाएंगे। मैं बच्चों का 'स्कूलÓ नहीं छुड़वाना चाहता, लेकिन यह तो तय हो कि 'स्कूलÓ में 'ब्लैकबोर्डÓ पर 'व्हाइट मार्करÓ चलाने वाला इतना योग्य जरूर हो कि शन्नो कोमा में जाने को विवश नहीं हो, या फिर मदरसे में इतने 'दरवाजे-खिड़कियांÓ खोले जाएं कि कोई शन्नो 'स्कूलÓ आने की हसरत नहीं पाले, तब भी आईएएस हो जाए...
पहली पत्नी का कल्याण नहीं कर सके, उन्हें आत्महत्या के पाप से नहीं बचा सके, एक पत्नीव्रत मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम अपनी पत्नी को गर्भकाल में तड़ीपाड़ (आज की परिभाषा के अनुसार, क्योंकि तब माता सीता के आचरण से सामाजिक समरसता टूट रही थी) घोषित करते हैं तो फिर उस स्कूल के टीचर (जो खुद महिला सशक्तिकरण से त्रस्त हैं) अपने स्टूडेंट्स की टूटती शादी कैसे बचाएंगे। मैं बच्चों का 'स्कूलÓ नहीं छुड़वाना चाहता, लेकिन यह तो तय हो कि 'स्कूलÓ में 'ब्लैकबोर्डÓ पर 'व्हाइट मार्करÓ चलाने वाला इतना योग्य जरूर हो कि शन्नो कोमा में जाने को विवश नहीं हो, या फिर मदरसे में इतने 'दरवाजे-खिड़कियांÓ खोले जाएं कि कोई शन्नो 'स्कूलÓ आने की हसरत नहीं पाले, तब भी आईएएस हो जाए...
