Sunday, April 19, 2009

एक आंसू शन्नो के नाम

पाखंडी समाज की सबसे बड़ी खासियत होती है, वहां के बहुत अधिक संख्या में एक साथ कठोर औैर लचीले सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक कानून। बात यहीं नहीं रूकती, इसके बाद अलग-अलग कानूनों का आपस में ऐसा नाभि-नाल संबंध जोड़ा जाता है कि एक को खांसी आए तो बाकी सबको मियादी बुखार हो जाए। मियादी बुखार चूंकि देह तोड़ देता है औैर टूटना कौन चाहता है?, सो अघोषित समझौता हुआ रहता है कि समय करे तो करे, नियमों, कानूनों को कुछ नहीं करने देना है। आप पूछेंगे, इतना लंबा भाषण झाडऩेवाला या तो बेहद पकाऊ इंसान होगा, या फिर बहुत बड़ा जानकार।मैं इन दोनों श्रेणियों से परे, अपनी शन्नो का अभागा बाप हूं, अयूब खान। पत्नी मरतीं, तो 'समाजÓ मुझे विधुर कहता, पता नहीं अब क्या कहेगा। वैसे हमने बस इतना सोचा था कि मदरसे जाने के बजाए हमारी शन्नो एमसीडी स्कूल जाएगी, तो आगे जाकर क्या पता डॉक्टर सॉक्टर बन जाए। यही सोचकर समाज का विरोध सह के भी बच्ची को 'स्कूलÓ भेजा। स्कूल का मतलब आप स्कूल जानेवाले नहीं समझेंगे। मेरा एक दोस्त है बिहारी, कहता है, उसके यहां अंग्रेजी में १० ही हर्फ होते हैं- ए, बी, सी, डी, ई, एफ, जी, एच और 'आईएएसÓ। बस। सो हमने सोचा कि मदरसे के ३६ हर्फ पढऩे के बजाए अगर 'स्कूलÓ के १० लेटर पढ़ेगी, तो क्या पता आईएएस हो जाए, वरना सुना है अब कश्मीर पार से अब लेडीज भी आतंकवादियों की हेड होने लगी है।यही सोचकर हमने बच्चियों को 'स्कूलÓ भेजा था। जब मैं विद्यार्थी था (ऐसे मैं ज्यादा पढ़ा-लिखा हूं नहीं) तो मौलवी कहते थे-'मार-मार कर सिखा देंगे।Ó शन्नो के कोमा में निधन के बावजूद मुझे बस यही याद है कि 'टीचरÓ मार-मार कर सिखा देंगे। मेरी और बेटियां भी उसी 'स्कूलÓ में पढ़ती हैं, क्या पता उन्हीं में से कोई आईएएस हो जाए। इसलिए टीचर के धक्के खाकर मुंह से खून गिराने (टीचर ने सोचा होगा, कितना भी पीटो, खून कैसे गिरेगा, वे तो सोच रही होंगी कि शन्नो ने साजिशन मुंह से खून निकाला होगा) के बाद शन्नो को मैं 'स्कूलÓ से लाने वाला था, तब भी केवल प्रिंसिपल टीचर के कहने पर ही अंतिम ३० मिनट के लिए 'स्कूलÓ में ही छोड़ आया। घर आई, दर्द से कराही, औैर फिर...ऐसे 'स्कूलÓ में मरने के अपने फायदे हैं। मरते ही ५० हजार का चेक आ गया। कुछ दिनों तक काम पर नहीं जाऊंगा तो भी काम चल जाएगा। लेकिन मुख्यमंत्री साहिबा ने टीचर के लिए कहा, ऐसी सजा मिले ताकि आगे के लिए नजीर बन सके..., फालतू का एक और बेरोजगार हो जाएगा। बेचारी टीचर की नौकरी चली जाएगी, अगर कुंवारी होगी तो कौन करेगा शादी? ऐसे भी महिला एवं बाल विकास मंत्री, दिल्ली कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स औैर पता नहीं कौन-कौन सफेदपोश कर्मचारी/संस्थान उस 'स्कूलÓ औैर उसके इस टीचर मंजू के खिलाफ हैं। सुना है शिक्षा को 'सोशल प्रोडक्टÓ बतानेवाले संस्थान (सीबीएसई, ज्ञान आयोग आदि) कह रहे हैं कि बच्चों को शारीरिक औैर मानसिक नुकसान पहुंचाना जुर्म हैं, लेकिन गांव में बिरजू भाई के गणित वाले मास्टर साब आज भी यही कहते हैं-'रेखागणित रेख मन माहीं, बिना मार के आवत नाहीं।Ó और लोगों को शायद ही यकीन हो कि आज के ज्यादातर आईएएस ऑफिसर इसी फलसफे को जीते-बरतते जीवन में इतने सफल हुए हैं।ये मेरी दिली इच्छा है, लेकिन मैंने सुना कि पिछले दिनों ब्रिटेन में एक ऐसा स्कूल खोला गया जिसमें शादीशुदा जोड़े एडमिशन लेंगे, ताकि वे सफल वैवाहिक जीवन के गुर सीख सकें। अगर वहां की सरकार हिंदू धर्मावलंबी होती तो मैं उनसे पूछता कि जब दुनिया में एकमात्र कल्याणकारी देवाधिदेव महादेव अपनी
पहली पत्नी का कल्याण नहीं कर सके, उन्हें आत्महत्या के पाप से नहीं बचा सके, एक पत्नीव्रत मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम अपनी पत्नी को गर्भकाल में तड़ीपाड़ (आज की परिभाषा के अनुसार, क्योंकि तब माता सीता के आचरण से सामाजिक समरसता टूट रही थी) घोषित करते हैं तो फिर उस स्कूल के टीचर (जो खुद महिला सशक्तिकरण से त्रस्त हैं) अपने स्टूडेंट्स की टूटती शादी कैसे बचाएंगे। मैं बच्चों का 'स्कूलÓ नहीं छुड़वाना चाहता, लेकिन यह तो तय हो कि 'स्कूलÓ में 'ब्लैकबोर्डÓ पर 'व्हाइट मार्करÓ चलाने वाला इतना योग्य जरूर हो कि शन्नो कोमा में जाने को विवश नहीं हो, या फिर मदरसे में इतने 'दरवाजे-खिड़कियांÓ खोले जाएं कि कोई शन्नो 'स्कूलÓ आने की हसरत नहीं पाले, तब भी आईएएस हो जाए...

...एक तड़ीपार, एक को पेरोलाभी


वरुण गांधी को पेरोल पर छोड़ा गया। माननीय अदालत ने उन पर लगाए गए एनएसए (राष्टï्रीय सुरक्षा कानून) को भाव नहीं दिया औैर कागज पर शर्तनामा लिखवाकर 'मैदानÓ में खुला छोड़ दिया। कानून के विशेषज्ञ कहते हैं कि उच्च और उच्चतम न्यायालय के पास यह अधिकार है कि ज्यूरी सजा के दायरे में आए या आनेवाले किसी अपराधी या संंदिग्ध के मामले को उसकी 'ग्रेविटीÓ के आधार पर जज करके, विशेष कारणवश कुछ दिनों के लिए जेल से बाहर खुली हवा में सांस लेने की अुनमति दे सकती है। इसी सिलसिले में वरुण गांधी को १४ दिनों के लिए खुली हवा में सांस लेने का मौका दिया गया, ताकि वे संसद पहुंचने की परीक्षा (चुनाव) का फार्म भर सकें। यहां तक मामला बिलकुल परफेक्ट शेप में दिखता है, क्योंकि हमारा कानून कहता है कि दोषी भले छूट जाएं, निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चाहिए और यहां तो वरुण पर एनएसए भी राज्य सरकार ने लगाया है। लेकिन जब उसी न्यायालय की यह बात याद आती है कि न्याय होना नहीं, दिखना भी चाहिए, तो डर लगता है।मेरे डर को जरा आप भी सुनें। प्राकृतिक न्याय का तकाजा है कि जब किसी जानवर से जान-माल का खतरा हो तो उसे मार दिया जाए। ऐसे ही अगर किसी व्यक्ति विशेष से समाज की समरसता मिटने का भय हो, तो पहले कदम के तौर पर ऐसे व्यक्ति को समाज से तड़ीपार किया जाता है, जैसा वेलेंटाइनों की शादी करवाने पर तुले श्रीराम सेना के प्रमोद मुतालिक के साथ किया गया, या फिर जैसा बिग बॉस के घर में साथ रह रहे अपने साथी जुल्फी की बुटीक में बवाल करने के बाद राजा भैया के साथ किया गया। और इससे भी जब बात बनती नहीं दिखती तब या तो इन जैसे समाजभंजकों के लिए जेल की काली कोठरी है या फिर न्यायालय के आदेश पर सीधे स्वर्ग की टिकट। यहां आप मामले पर गौर फरमाएं, प्रमोद मुतालिक के चेलों ने पब से लड़कियों को घसीटकर पीटा था, बदले में तड़ीपार हुआ, लेकिन जब वरुण पीलीभीत में, सामाजिक मंच पर, समाज की मौजूदगी में, समाज में धार्मिक हिंसा फैलाने के लिए 'कच्चा मालÓ (उनके जहर बुझे भाषण) तैयार करते हैं, तो माननीय अदालत उन्हें पेरोल पर बाहर आकर चुनाव लडऩे की अनुमति देती है। मेरा माननीय अदालत की अवमानना का कोई विचार नहीं है लेकिन एक आम नागरिक की तर्ज पर न्यायिक संस्था से यह पूछने का मूल अधिकार तो है ही कि वरुण और संजय दत्त जैसों के लिए जेल के बजाए खुली हवा क्यों? हालांकि माननीय अदालत के उस तर्क से 'कानून पसंद नागरिकोंÓ को रूहआफ्जा वाली दिली ठंडक मिली, जिसमें ये कहा गया कि अदालत कोई गलत नजीर नहीं पेश करना चाहती, आप देखें कि यही संजय चुनावी सभा में एक मुख्यमंत्री को पप्पी और झप्पी देना चाहते हैं। खैर, मैं वापस आता हूं अपने डर पर। कल को अगर मोहम्मद अफजल अदालत से दरख्वास्त करें कि उन्हें मरने से पहले काबा की पवित्र यात्रा करने दिया जाए, तो क्या अदालत सरकारी खर्च पर उन्हें काबा भेजेगी? अभी मोहम्मद अजमल अमीर कसाब ने अदालत में बयान दिया कि उसने जब अपराध किया, तब वह नाबालिग था, सो उसका केस बाल अदालत में चलाया जाए। कानूनी भाषा में अगर कसाब २६/११ को नाबालिग थे, तो उन पर बाल अदालत में ही मुकदमा चलाया जाना चाहिए, लेकिन अदालत ने कसाब की वह मांग खारिज कर दी। अगर न्याय की परिभाषा है कि कटघरे में खड़े व्यक्ति को बचाव का पूरा मौका दिया जाएगा, तब तो कायदे से कसाब की बात की टेस्टिंग कर लेनी चाहिए थी।
भारत क्या, कहीं भी ऐसा नहीं होगा, क्योंकि कसाब जैसों के साथ 'देशÓ नामक भावना जुड़ जाती है। ये तो सबने देखा, महसूस किया कि कसाब और उनके साथियों ने देश की छाती पर कैसा नंगा नाच किया, लेकिन उसी देश ने यह भी देखा, सुना और महसूस किया कि वरुण ने सामाजिक मंच से नंगा नाच किया। फर्क सिर्फ गोली और बोली का है। मान लीजिए कि भारत, अमेरिका हो गया। ऐसे में वह निश्चित रूप से कसाब और उनके आकाओं को कब्र से भी निकालकर फांसी देने की कुव्वत रखता है, लेकिन एक और बार मानिए कि भारत की संसद में भगवान श्रीहरि विष्णु औैर अल्ला दोनों सांसद बनकर आ गए तो दोनों मिलकर भी क्या वरुण की बोली (हालांकि उनकी बोली की फोरेंसिक जांच चल रही है) के मैन और साइड इफैक्ट से देश को बचा पाएंगे? मंडल की टीस आज भी समाज भोग रहा है, बाबरी मस्जिद की 'लाल ईंटेंÓ देश हर पल अपनी छाती पर महसूस करता है। १२० करोड़ की आबादी में, एक मां को छोड़ कोई भी वरुण के सीधे बचाव में नहीं आया, तो फिर पेरोल क्यों? अगर केस कमजोर था और मामला हाई ्रप्रोफाइल था तो रोजाना सुनवाई करवाई जाती (८४ के सिख दंगे वाले केस में किया गया) होती, फैसला होता, निर्दोष होते तो छाती ठोंककर संसद फतह करते।====================================तो बात बन जाएं!क्या चल रहा है, कैसे जीवन का मजा लिया जा रहा है, यह ऐसे सवाल है जो आपको निराश भी कर सकते हैै। भीड़ भरी जिंदगी और भागती लाइफ में यदि कुछ पल का आराम मिल जाये तो यार बात ही बन जाये। लेकिन इन पलों को कहां और कैसे तलाशते है जरा सोचिए, टीवी देखकर, बाहर घूमकर, घर का काम करके आदि। यह लिस्ट काफी लंबी होती है लेकिन आराम और चैन कहां। बोरिंग लाइफ में नया पन लाने के लिये आपको जरूरी है कि आपकी लव लाइफ को मस्ती भरा होना। अब आप सोचेंगे कि यह कैसे। जी हां, यदि आपकी सेक्स या लव लाइफ बिलकुल मस्ती के टै्रक पर है तो सोचिए कि आप स्वस्थ, खुशनुमा इंसान है। क्या आप अपने सेक्स जीवन में निरसता का अनुभव कर रहे हैं? कुछ ऐसे साधारण से उपाय हैं, जो नीरस सेक्स जीवन में नए रंग भर सकते हैं। जिससे जिंदगी में एक नया उत्साह आ जायेगा।आँखों की पट्टी: सिल्क या अन्य किसी कपड़े की छोटी पट्टी बनाइए और अपने साथी की आँखों को ढक दीजिए। इसके बाद उन्हें सोचने दीजिए कि आप क्या करने वाले हैं। नए प्रयोग कीजिए। आँखों पर पट्टी बंधी होने से आपके साथी को भी कुछ अलग सा अहसास होगा। लुकाछिपी का यह खेल काफी मजेदार साबित हो सकता है। आजमा कर देखिए. सुगंधित तेल:अच्छी खुशबू दिलो दिमाग को तरोताज़ा कर देती है। आप अपने शयनकक्ष में कुछ ऐसे सुगंधित तेल रख सकते हैं, जिनका इस्तेमाल मसाज करने मे किया जा सकता हो। यह भी कुछ नया अनुभव देगा। हथकड़ी: सचमुच की ना सही! किसी भी कपड़े का इस्तेमाल आप हथकड़ी बनाने में कर सकते हैं। बस अपने साथी के हाथ कपड़े से बांध दीजिए [ध्यान रखें की उन्हें चोट ना लगे]। इस तरह से कुछ देर के लिए वह आपका गुलाम बन जाएगा (यकीन मानिए इससे उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी)। इसके बाद के क्षण आपके होंगे! बड़ा सा आईना: कभी कभी खुद अपने वे क्षण देखना भी रोमांचकारी हो सकता है। तो क्यों ना आप अपने पलंग के पास किसी बड़े आईने को रख दें। इसके नतीजे रोमांचकारी होंगे। सोफ्टी: रसोईघर में जाएं और फ्रिज में से सोफ्टी, स्ट्राबेरी, क्रीम, जैम अथवा जेली कुछ भी ले निकाल लीजिए। यह सूची कितनी भी लम्बी हो सकती है। अब यह आपके और आपके साथी के ऊपर है कि आप दोनों इनका किस तरह से इस्तेमाल करते हैं। प्रयोग तो अनेकों हैं। कुछ नया सोचिए।
लिपस्टिक: जी हां, लिपस्टिक से एक-दूसरे की बॉडी पर किस करने की प्रतियोगिता आपको एक नया अंदाज भी देगी। ये सभी प्रयोग सेक्स जीवन और अंतरंग क्षणों में नए रंग भर सकते हैं। लेकिन ये पल बेहद निजी होते हैं, इसलिए आप स्वयं ही जान सकते हैं कि आप दोनों कैसे चरम संतुष्टि पा सकते हैं। और जीवन को रंगीन बना सकते है।