Sunday, May 10, 2009

ये तो होना था...

गोल्ड स्मिथ से लेकर जब हम अमत्र्य सेन औैर डॉ युनुस खान तक आए तब तक विकास की कई परिभाषाएं जनमकर, पनपकर आपस में ऐसी उलझीं कि हमें विकास के बजाय विकास के न्याय की बात करनी पड़ गई। बचपन में अरावली, शिवालिक, विंध्याचल की पहाडिय़ों के जिक्र बड़े चाव से पढ़ता था और जब टीचर पूरे सुर-ताल में कहते थे-'सतपुड़ा के घने जंगल, नींद में डूबे हुए, ऊंघते-अनमने जंगलÓ तब यह बात समझ से परे थी कि जंगल को नींद कैसे आएगी। आज फरीदाबाद और गुडग़ांव के कई चक्कर लगाने के बाद इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि सतपुड़ा का पता नहीं, मगर दिल्ली की सीमा पर मेवात, गुडग़ांव और फरीदाबाद को पानी देनेवाली अरावली के जंगल तो मर रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार विकास के नाम पर चल रही खुदाई की वजह से इस इलाके का भू जल-स्तर ३०० मीटर नीचे जा चुका है। आप यह न सोचें कि यह मामला सीधे तौर पर आपकी जिंदगी और राजनीति से नहीं जुड़ा है। फरीदाबाद और गुडग़ांव के बीच फंसे दक्षिण दिल्ली के इलाके (बदरपुर से लेकर महरौली तक का १३ किलोमीटर का इलाका १२ महीने सूखा रहता है) में वह दिन दूर नहीं जब पानी को लेकर मर्डर होंगे। वहां के विधायकों और सांसद अभी तक इस समस्या का हल नहीं कर पाई, सरकार भी शायद सोई रही तो अब जाकर न्याय के मंदिर (सुप्रीम कोर्ट) ने अपना घंटा बजाकर चारों ओर मुनादी करवा दी है कि इस इलाके में अब कोई खनन कार्य नहीं होगा।हरियाणा के अरावली हिल्स रेंज में पर्यावरण को गंभीर नुकसान का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि असाधारण हालात में असाधारण उपायों की जरूरत होती है। यह पाबंदी हरियाणा के गुडग़ांव, फरीदाबाद और मेवात जिलों के करीब 448 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में लागू होगी। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय राजधानी की पांच किलोमीटर की परिधि में खनन पर पाबंदी लगाई थी। कोर्ट ने ८ मई के अपने फैसले में कहा कि इलाके में पर्यावरण और खनन से जुड़े कानून के एक भी प्रावधान का पालन नहीं किया गया। सैटलाइट इमेज दिखाते हैं कि बड़े स्तर पर खुदाई के कारण भारी नुकसान हुआ है। इसलिए अब इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती। लेकिन मुद्दा यह नहीं है कि न्याय के मंदिर को अपना 'राजदंडÓ इस्तेमाल करना पड़ा। मुद्दा यह है कि इस मंदिर ने राजदंड उठाने का कारण क्या बताया। कारण यह बताया गया कि 'माइनिंग टिकाऊ विकास के सिद्धांत के तहत है, पर इसे संतुलन के सिद्धांत के तहत भी देखना होगा।Ó माइनिंग टिकाऊ विकास के सिद्धांत से आगे जाकर हो तो यह पाबंदी के सिद्धांत तहत आती है। यह हदों का मामला है। कहने का आशय यह कि टिकाऊ विकास (डवलपमेंट) जरूरी है मगर सततीय विकास (सस्टेनेबल डवलपमेंट) की कीमत पर नहीं। देश भर में ऐसे ही हरित प्रदेश की कमी होती जा रही है। परिणाम भू जल का स्तर नीचे जा रहा है। शहरों में लोगों को पीने का पानी नहीं मिल रहा है। ऐसे भी माइनिंग का पर्यावरण संरक्षण के साथ संतुलन और माइनिंग पर पाबंदी एक ही सिद्धांत के दो पक्ष हैं। बीते सालों में सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण संरक्षण के जरिये माइनिंग को संतुलित करने की कोशिश की है। हालांकि 2004 में ही यह पाया गया था कि नियमों का पालन नहीं हो रहा है, इस कोर्ट ने मौजूदा माइंस के लिए नियमों के पालन पर जोरदार चेतावनी जारी की थी, जिसका मतलब यह नहीं था कि टिकाऊ विकास के सिद्धांतों पर पाबंदी लगा दी गई। हालात सुधरने की जगह बिगड़ गए। कोर्ट को ज्यादा व्यापक नजरिये से देखना पड़ा। कोर्ट ने पहले ही कहा था कि अगर पर्यावरण के नुकसान जारी रहा और उस हालात पर पहुंच जाए जहां से लौटा नहीं जा सकता तो माइनिंग पर पाबंदी के लिए विचार किया जा सकता है। हुआ भी यही। इसी का डर था। इसी की आशा थी। डर उनलोगों के हिस्से का था जिन्हें इस खनन से प्रत्यक्ष फायदा था, आशा उनलोगों को थी, जिन्हें इससे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों फायदे मिलने थे। चाणक्य नीति में एक जगह चर्चा है कि नदी के पानी पर, किनारे रहनेवाले का स्वाभाविक हक है। सो अरावली की पहाडिय़ों की ताजा हवाओं और जल पर फरीदाबाद, मेवात, गुडग़ांव सहित बदरपुर-महरौली की सीधी पट्टïी का प्रथम हक होना चाहिए। हालांकि कोर्ट के डिसीजन में स्थानीयता का जरा भी पुट नहीं दिखता, लेकिन अगर सततीय विकास को लक्ष्य कर किए गए फैसले में स्थानीय जनाकांक्षा शामिल हो तो क्या कहेंगे। यही कि... ये तो होना था।

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