Monday, May 4, 2009

लिपस्टिक के साथ वोट क्यों नहीं है फैशन में

महानगरों में बहुत तरह की महिलाएं रहती हैं। मसलन सड़क पर झाड़ू लगाने वाली और घर में बर्तन साफ करने वाली से लेकर पेज थ्री पार्टी में सुर्ख लाल लिपस्टिक और उजले बालों वाली लेडीज तक। अच्छा, यहां की एक और खासियत होती है। पूछो क्या? उपर्युक्त वर्णित महिलाओं और लेडीज के घरों में आय के हिसाब से टीवी है, केबल लाइन भी है। यानी इस बात की पूरी छूट है कि लेडीज गुड टाइम्स पर शिल्पा शेट्टïी को योगा सिखाते देख गुस्से से जलें, फैशन शोज देखकर अपनी बॉडी शेप को आईना में देखें, जूम पर पेज थ्री पार्टी देख अपने किसी को फोन करके पूछें कि उन्हें क्यों नहीं बुलाया..., और झाड़ू लगानेवाली महिलाएं गिलास में चाय पीते हुए 'रसिक बलमाÓ वाला कोई फूहड़ गाना सुनकर स्त्री-आजादी के अलौकिक एहसास से भर जाएं।जिस घर में टीवी घुस गया है, उस घर की यह लाइफ स्टाइल हो गई है। लेकिन तब लाख टके का सवाल है कि टाइट फिटिंग की ड्रेस पर लो कट ब्लाउज (ये महिला-लेडीज दोनों का प्रिय फैशन है, क्योंकि यह उन्हें फ्री होने का एहसास कराती है) का फैशन जीनेवाली महिला/लेडीज के फैशन स्टेटमेंट में अभी तक वोट करना क्यों नहीं आ पाया है?ऐसे ये महिलाएं और लेडीज वोटिंग और सेक्स को लेकर एक राय रखती दिखती हैं। अपने ऑब्जर्वेशन में मैंने देखा है कि गांव से शहर और फिर महानगर तक जब तक ये लड़कियां और गल्र्स होती हैं, वोट और सेक्स को लेकर एक-सा एक्साइटमेंट रखती हैं। मसलन मम्मी/मां किचन में परेशानी का बहाना मार सकती हैं लेकिन ये (लड़कियां/गल्र्स) पापा का हाथ पकड़ वोट की लाइन में कुछ इस एहसास के साथ लगती हैं कि देखो, पुरुषो!, यहां भी मैं तुम्हारे साथ हूं। हालांकि इस बात से बहुतों को आपत्ति हो सकती है, लेकिन सिर्फ उन्हें तीनों जगहों की लड़कियों/महिलाओं या गल्र्स/लेडीज के जीवन को नजदीक से नहीं देखा है। ज्यों ही ये लड़कियां/गल्र्स, महिला/लेडीज में कन्वर्ट होती हैं, उनका इतना एक्सप्लोरेशन या कहें कि एक्सप्लायटेशन हो जाता है कि उनमें एक अजीब किस्म का ' दार्शनिक नकार भावÓ आ जाता है, जैसे दो-तीन बच्चे जनने के बाद या ४०-४५ की उम्र के बाद उनमें सेक्स के प्रति अजीब किस्म का नकार भाव आ जाता है। अब यहां नकार के भी दो अलग-अलग कारण हैं। महिलाएं समझने लग जाती हैं कि बच्चे हो गए सो अब सेक्स की क्या जरूरत?, जबकि कुछ किताबें पढ़ लेने के कारण लेडीज समझने लग जाती हैं कि बेवजह का 'घावÓ क्यों लिया जाए। बल्कि वे तो एक कदम आगे बढ़कर इस मुकाम पर पहुंचने के बाद, लेस्बियन/गेइज्म और एक्सट्रामैरिटल अफेयर्स के अंतहीन प्रवचनों में लीन हो जाती हैं।परिणाम यह कि जैसे सेक्स से विरक्ति, वैसे वोट से। अगर विधानसभा, लोकसभा चुनाव और उपचुनावों को जोड़ दिया जाए तो तकरीबन हर छह महीने में देश में चुनाव होते हैं, लेकिन चैनल, अखबार उसे महिलाओं-लेडीज तक पहुंचा ही देते हैं। यहां मीनोपॉज से ठंडी पड़ी लेडीज देखती है कि उसके ड्राइंग रूम में दो तरह की चर्चा हमेशा होती है- 'सेक्स और चुनावी राजनीतिÓ। सो उन्हें दोनों से खास किस्म की नफरत होने लगती है जो बाद में विरक्ति में बदल जाती है। घाघ राजनेता इस सच को बारीकी से पहचानते हैं इसलिए दिल्ली में जीत की हैट्रिक लगाने वाली महिला मुख्यमंत्री होने के बावजूद यहां इस बार भी महिला मुद्दा नहीं है। तो जब वह केंद्र में ही नहीं है तो वह जोश कहां से लाए, जो २० साल की उम्र में उनमें खुद-ब-खुद आ जाता था। अब तो उसने हर बात पे हारना सीख लिया है। महिला आरक्षण बिल इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। सिर के बाल नहीं नोंचते हुए आप ये समझें कि वोट नहीं करके, कहीं गहरे
इनके चोटिल अहं को मरहम मिलता है। शायद...

No comments: